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शनिवार, अगस्त 20, 2011

काफी सही, कुछ गलत है ये फिल्म


दिल्ली सिर्फ चांदनी चौक और करोल बाग में या जनपथ-राजपथ पर ही नहीं बसती। एक दिल्ली, खालिस-भदेस दिल्ली उन ग्रामीण इलाकों में बसती है, जो पहले दिल्ली की सरहद पर थे और अब इसका हिस्सा हैं। उस दिल्ली को सेल्युलाइड पर पहली बार जोरदार ढंग से प्रवीण डबास ने दिखाया है। प्रवीण को अब तक आप एक मॉडल एक्टर के तौर पर जानते थे, जो मॉनसून वेडिंग और खोसला का घोसला के लिए याद रह जाते हैं। मगर सही धंधे-गलत बंदे एक दूसरे डबास को हमारे सामने रखता है। न्यू यॉर्क फिल्म इंस्टिट्यूट में सीखी चुस्ती को किरदारों के डिटेल्स डिवेलप करने में यूज करता, साथ ही ग्रामीण दिल्ली के औचक ह्यूमर और बेचारगी को त्रासद रूप में पेश करता राइटर और डायरेक्टर, जो फिल्म के लीड रोल में भी है। सही धंधे, गलत बंदे की कहानी और कैमरे में कई अच्छे प्रयोग हैं, मगर ट्रैजिडी को गाढ़ा करने के लिए कहानी में कन्टीन्यूटी और टेंशन होना जरूरी है। वो कहीं-कहीं मिस होता है। हरियाणवी भाषा की वजह से ह्यूमर के लिए बहुत गुंजाइश थी, वो कहीं-कहीं ही नजर आता है। इसके अलावा एक्टर प्रवीण की बॉडी लैंग्वेज उतनी रफ नहीं हो पाती, जितने की उन्हीं का लिखा कैरेक्टर राजबीर डिमांड करता है। इतना सब कहने के बाद भी मैं आपको सलाह दूंगा कि ये फिल्म एक बार देखनी चाहिए। क्यों ये आगे बताता हूं।

कच्चेपन की महिमा

फिल्म की कहानी प्रवीण के अपने गांव कंझावला और अपने एक्सपीरियंस के इर्द-गिर्द घूमती है। कंझावला दिल्ली के बाहरी इलाके में बसा एक गांव है। प्रवीण के पिता समेत वहां के तमाम किसान सरकारी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पिछले कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं। इसी थीम को प्रवीण ने अपनी पहली कहानी का आधार बनाया। कहानी है चार लड़कों की, जिनके निकनेम से उनके किरदार की लय पता चलती है। ये बालक हैं राजबीर (प्रवीण डबास), सेक्सी (वंश भारद्वाज), अंबानी (आशीष नय्यर) और डॉक्टर (कुलदीप रूहिल)। राजबीर का बाप जमीन के रेट चढऩे के गुमान में दारू पी और गड्डी खरीद मर गया, फिर मां भी मर गई, जमीन बिक गई। सेक्सी जैसा की नाम से पता चलता है छिछोरा टाइप और चब्बी चेजर है। अंबानी हर वक्त कैलकुलेटर लिए फिरता है और एक बड़ा हाथ मार सेटल होना चाहता है। डॉक्टर बीवी बच्चों वाला है और मेडिकल स्टोर चलाने की वजह से ये नाम पाता है। कंझावला के रहने वाले ये चारों एक छुटभैया गैंग चलाते हैं और एमएलए का सपना पाले फौजी (शरत सक्सेना)के लिए घर खाली कराने, धमकाने जैसे काम करते हैं। फिर फौजी इनको सौंपता है अपने ही गांव के लोगों का धरना तुड़वाने का काम और यहीं पर राजबीर की आत्मा जाग जाती है। अगर डॉक्टर का डायलॉग लेकर कहूं तो उनके अंदर से आवाज आती है कि बदमाश हैं, मगर कमीने नहीं हम। अब एक तरफ है सूबे की सीएम, जमीन पर कब्जा कर इंडस्ट्री बनाने की फिराक में लगा घाघ बिजनेसमैन अग्रवाल(अनुपम खेर) और उसका साथ देता फौजी और दूसरी तरफ है राजबीर की चौकड़ी। बंदे गलत हैं, मगर इस बार काम सही उठाया है। कैसे निपटाते हैं वे मुश्किलें, इसी से फिल्म का अंत तय होता है।

फिल्म में कई चीजें बहुत अच्छी हैं। जैसे ओपनिंग ट्रैक में फोक सॉन्ग का इस्तेमाल, गांव के धुंधले-भूरे विजुअल और चार बच्चों का ऊधम, जो बाद में लीड कैरेक्टर बनते हैं। धरने के दौरान रागिणी का सीक्वेंस बहुत प्रामाणिक और उसकी वर्डिंग बहुत मौजू है। इसके अलावा कई जगह डायलॉग उम्दा हैं। बालकों ने अपने किरदार में नांगलोई, नजफगढ़ की हवा पानी को उतार कर रख दिया। मुंबई माफिया पर, उसकी मैकेनिज्म पर हमने बहुत फिल्में देखीं, मगर दिल्ली में ये तंत्र कैसे काम करता है, ये फिल्म बखूबी दिखाती है। यूं समझ लें कि खोसला का घोसला में प्लॉट के बाहर लाठी लिए खड़ा वो गबरू, जो अनुपम खेर की फैमिली से कहता है कि मैं तेरा फूफा ओमवीर, ये फिल्म उसी ओमवीर की अपनी त्रासदी की कहानी है।


काश यूं होता कभी

फिल्म में जमीन का मुद्दा है, सरकारी तंत्र के आगे बेबस किसान हैं, मीडिया का रोल है और गुस्साए युवा हैं। अन्ना मूवमेंट के इस मोड़ पर रिलीज हुई इस फिल्म को इससे बेहतर समय संदर्भ नहीं मिल सकता था। मगर फिल्म की स्क्रिप्ट कई जगह सुस्ताती और झोल खाती है, जिसकी वजह से दर्शक पहलू बदलने लगता है। सीएम के बेटे की कहानी, उसका एटीट्यूड और लास्ट में उसका गांव वालों के सपोर्ट में आना फिल्मी सा लगता है।राजबीर का लव ट्राएंगल जबरन ठूंसा गया है, गोया हीरो के एक दूसरे साइड को दिखाने पर ही उसके अंदर का ह्यूमन पूरा नजर आता। इसके अलावा अनशन की साइट पर मीडिया के नाम पर सिर्फ एक ही टीवी पत्रकार का होना अजीब लगता है। वह भी तब जब सूबे की सीएम का बेटा धरने पर बैठा हो। फिल्म में नई लोकेशन हैं, किरदारों का लहजा नया है, मगर इन कुछ बारीक चूकों के चलते इसकी विश्वसनीयता कुछ घट जाती है। फिल्म खुद की जगाई उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाती, इसलिए कुछ अफसोस भी रह जाता है। ऐसा फील आता है कि यार अच्छी थीम और ट्रीटमेंट था, बस थोड़ी सी गुंजाइश रह गई। मगर पहली फिल्म के लिहाज से डबास का होमवर्क जबर्दस्त लगता है। ये फिल्म एक अनछुई दिल्ली और उसके बाशिंदों की तकलीफ समझने के लिए देखिए, कच्ची यानी कंक्रीट के बजाय मिट्टी की जमीन पर रहने वालों की दिल्ली के लिए देखिए। अच्छी से चिन्नी भर कम, मगर एवरेज से कहीं ज्यादा है सही धंधे-गलत बंदे।
2.5 star

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