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सोमवार, अक्तूबर 01, 2012

सच के सीने में नश्तर, मैं इक औरत

गद्य गढ़ा हुआ होता है, कविता स्वाभाविक होती है
गद्य लिखा जाता है, कविता कही जाती है
कहना स्वाभाविक क्रिया है, लिखना अर्जित बदमाशी है
इसलिए हे संत भदंत पहले एक कविता का पारायण करें

बेकार कुछ नहीं होता
बेकार नहीं होता शादी के डेढ़ साल में पति
टूटी हुई मटमैली हुई कुर्सी पर बैठा टिड्डी
नोट्स की तरह अखबार पढ़ने की मजबूरी
जिसके बीच से झरते हैं कमर्शल ब्रेक की तरह पैंफलेट
कई दिनों से बक्से पर जमे लट्टू भी बेकार नहीं होते
किसी दोपहर की बोरियत उनके सहारे मचल लेती है कुछ वक्त
और देखा जाए तो ये शब्द बेकार भी
बेकार कहां होता है
कितना कुछ कह जाता है ये काम का


माफ कीजिएगा, मगर सच बोलने का हलफनामा उठाया है, तो झूठ ही बोलूंगा। पहला कि ये कविता महज तीन लाइन में बनी थी कि बेकार कुछ नहीं होता, डैश डैश डैश और देखो तो ये बेकार शब्द भी कहां बेकार होता है...
उसके बीच में बौद्धिक जुगाली है क्योंकि तीन लाइन की भी भला कोई कविता होती है, छोटी बात तो लोफरों के जुमलों सी होती है, तमाम सिमरनों को सरसों के खेत में झुकने पर मचलती सी देखती.
हां तो आज हम कुछ और कहने के लिए पेशे नजर हुए हैं

सच एक मैस्कुलिन कंसेप्ट है। पुरुष की बदमाशी की नजीर है ये, जो आज तक औरत की नजर से नहीं हटी।
सच मौत नहीं है, क्योंकि मौत में तो गति है, मगर सच स्थिर करने की साजिश है। जो जो गतिमान लगा, जीवमान लगा, उसे तय करने की, स्थिर करने की कोशिश हुई और फिर उसे कहा गया कि देखो ये सच है, सच जो सदा था, है और रहेगा...और ये सच कब बोला गया, जब पुरुष को लगा कि उसने जान लिया है कि इसे अगर सच की चिप्पी चिपका न रखा गया, तो बवाल हो जाएगा, बयान भटकने लगेंगे, बाग बहकने लगेंगे और तब फूलों को माली की जरूरत न पड़ेगी।

तो साहिबान मसला ये है कि पुरुषों को इस फलसफे को, जिसे तफरीह के लिए सच का नाम दिया गया, गढ़ने की जरूरत क्यों आन पड़ी। क्यों वो चीजों को स्थिर करना चाहता है। क्या सच कहना, सच बताना या किसी भी अजूबे को सच का नाम देना, उसे मार देना नहीं है...

सच आपको रोक देता है, कल्पना के आकाश में से निकालकर पाताल में पटक देता है और कहता है कि लो ये है इसकी चौहद्दी, अब बिना किसी सवाल के इसी में घुटो, मरो क्योंकि ये सच है और सच तो सातत्य लिए आता है...

मगर सच कुछ नहीं होता, जैसा महान हो सकने की जिद पाले कवि कहता है कि बेकार कुछ नहीं होता
सच मुछ कुछ नहीं कर रहा है, ये तो मेरे सच की शैतानी है

तो सच कहूं तो मुझे यकीन नहीं कि सच कह पाऊंगा कभी, इसीलिए झूठ की तलाश है
झूठ कल्पना चाहता है, रंग चाहता है, तरंग चाहता है
कलाकार झूठा होता है, क्योंकि वो सच के पर्दे को फाड़कर पीछे का कत्था, चूना, पीक और सींक
सब मंच पर ले आता है
बिना किसी उदघोष के, इसका भी ध्यान नहीं रखता कि नील टिनोपाल वाले कपड़ों से गमके बैठे
ये साहिब और हुक्काम सुंदरता देखने आए हैं इस शाम
मगर इन सबके बीच हो रहा है झूठ का काम तमाम
इसलिए मेरी सबको राम राम
क्योंकि एक सच्ची सी दुनिया में
एक झूठा फसाना हूं
ताना और बाना हूं
बेताल का गाना हूं...


पी एस:
पुनश्च साला अमीर सा शब्द लगता है, लोड से लदा हुआ
पीएस में आई लव यू वाली गुदगुदी है
हां तो पीएस
पोस्ट का नाम है
सच के सीने में नश्तर, मैं इक औरत
औरत के बदले झूठ भी लिख लो
या फिर झूठ का नाम औरत लिख लो
मरद हो कुछ भी दिक करो
क्या गुनाह दरज हो
मगर कल्पना में, गुस्ताखी में
औरतें ही रही हैं अव्वल
सो इस इक पल, मैं इक औरत हूं

शुक्रवार, जून 22, 2012

इंडिया की गॉडफादर


गैंग्स ऑफ वासेपुर देखिए और इंडिया के सिनेमा पर गर्व कीजिए, घटिया फिल्मों को हिट करवाने के पाप से मुक्त होने का भी मौका है ये

सौरभ द्विवेदी
अकसर उन हजारों साल पहले पैदा हुए ऋषि मुनियों के नाम पर सिर झुकाना पड़ता था, जिन्होंने रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्य लिखे। वजह, कहानियों का अपार विस्तार, उसमें भरे हजार भाव और इन सबके बीच वीतराग सा पैदा करता एक दर्शन, जो जीवन के सार और उसके पार का भाष्य रचता है। कथा के इस तरीके को महाकाव्य यानी एपिक कहते हैं। सिनेमा हमारे समय में कथा कहने का सबसे ताकतवर तरीका है और आखिर सौ बरस के इंतजार के बाद इंडियन सिनेमा को अपना पहला महाकाव्य मिल गया। गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म सिनेमा शब्द में गर्व भर देती है, मगर हमारे लिए बहुत बड़ी मुश्किल पैदा कर देती है। महज पांच-छह सौ शब्द में कैसे बताया जाए कि फिल्म में क्या है। बहरहाल, हर महाकाव्य की तरह यहां भी नियति और कर्म के बीच कर्म को चुनना होगा।
वासेपुर कहने को तो भूगोल के लिहाज से धनबाद में है, मगर हम सबके पास अपने अपने वासेपुर हैं। और यहां सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई नहीं होती। घाट पर कपड़ों से पानी फचीटते लोगों के बीच रोमैंस होता है, काई से पटे तालाब की हरियाली में हरा भरा होता। यहां जब चिमटा गढ़ते लोहार से पूछा जाता है कि पतली नाल से क्या होगा, तो जवाब आता है कि गन फटकर फ्लावर हो जाएगी। हाथ में बंदूक आते ही हर युवा विजय दीनानाथ चौहान बन जाता है और अमिताभ के अंदाज में एक हाथ को हवा में टांग दूसरे से निशाना साधने लगता है। सवर्ण हिंदू घरों में कोई नीची जात का या मुस्लिम आता है, तो अलमारी से कांच के बर्तन झाड़ पोंछकर निकाले जाने लगते हैं। और पति की तमाम दिलजोई और बेवफाई के बावजूद पत्नी आखिर में बस यही कह पाती है कि घर में मत लेकर आना बस।
हमरे जीवन का इक ही मकसद है...बदला
दुश्मनी ज्यादा गाढ़ी होती है। बहे, जमे खून की तरह। या यूं कहें कि रगों में पानी सा खून बहता ही है किसी का खून बाहर निकाल जमने के लिए छोड़ देने को। और दुश्मनी वक्त की थाली में तरी की तरह फैले, इसलिए प्यार का मसाला चाहिए होता है बीच बीच में। गैंग्स ऑफ वासेपुर कहानी कहने को दुश्मनी की है, मगर इसके बीच में अनगिनत सूखे मुरझाए फूलों की खुशबू भी पैठी हैं। वासेपुर में कुरैशियों की चलती है। उनका काम मीट काटना। और आखिर में इंसान भी तो बस मीट ही है। सो उनका खौफ इंसानों पर सिर चढ़कर बोलता है। इनके बीच एक पठान राशिद खान सुल्ताना डाकू के नाम पर डाका डालता है। नए नए पइसे से सबका जी मचलाता है और राशिद को देश-निकाला दे दिया जाता है। नया मुकाम धनबाद, काम कोयले की खदान में हाथ सानना। सिर पर पनाह आती है ठेकेदार-मालिक-नेता रामाधीर सिंह की। मगर राशिद की आंख में बगावत का सुरमा उन्हें समय रहते दिख जाता है। राशिद दूसरे लोक रवाना हो जाते हैं, रह जाते हैं उनके भाई फरहान और बेटा सरदार। सरदार को रामाधीर सिंह को मारना नहीं है, खत्म करना है। धीमे-धीमे, कह के।
बस यहीं से सरदार और रामाधीर के बीच एक तराजू उग आता है। वजनों के लिए पाट लगातार बड़े करता। इस दौरान तमाम किरदार आते हैं और कहानी के कई रंग स्याह करते जाते हैं। पहले हिस्से के अंत तक पलड़ा एक ओर नहीं झुकता, लगातार हिलता रहता है, डराता रहता है, सहलाता रहता है।
क्यों दिए हैं पांच सितारे
- फिल्म की कहानी बेहद चुस्त है। तीन पीढिय़ों तक फैली कहानी, मगर कहीं से भी फैली नहीं। एक एक किरदार ऐसे रचा गया है, गोया वही फिल्म का केंद्रीय पात्र हो।
- गाने। अनुराग कश्यप की फिल्मों में ये न तो सिचुएशन पर ढाले गए होते हैं और न ही एक दम से बीच में आकर हीरोइन को हीरो संग पैर झमकाने का मौका देते। ये तो बस प्रोस के बदन पर पोएट्री की तरह पहनाए होते हैं। बेहद स्वाभाविक और सीन के सुख को सजीला करते। गैंग्स ऑफ वासेपुर के गाने बरसों बरस सुने जा सकते हैं।इसका म्यूजिक असल है, किसी स्टूडियो के एसी और साउंडप्रूफ कमरे की घुटन से मुक्त। शुक्रिया स्नेहा, वरुण और पीयूष।
- कास्टिंग एक क्लैसिक अध्ययन हो सकती है। एक्टिंग की बात करें तो मनोज वाजपेयी ने अगर हिम्मत कर सच बोलूं, तो अल पचीनो सी ऊंचाई हासिल की है। ये उनकी गॉडफादर है। उनके अलावा नवाजुद्दीन सिद्दिकी, पंकज त्रिपाठी, ऋचा चड्ढा, तिग्मांशु धूलिया जैसी एक लंबी कतार है, जिनकी तारीफ के लिए मेरे पास शब्द हैं, मगर फिलहाल जगह नहीं।
- डायरेक्शन। अनुराग जीनियस हैं, ये ब्लैक फ्राइडे से साबित कर चुके हैं। कल्पनाशील हैं ये नो स्मोकिंग बताती है। राजनैतिक समझ गुलाल से साबित हुई, तो बॉक्स ऑफिस का प्रेत देव डी के जरिए डिब्बे में बंद हो गया। अब बारी थी इन सबके मेल की। फिल्म में कैमरा दूरबीन लगी छलिया आंख की तरह है। माइन में विस्फोट के सीन हों, या कस्बे की हालात दिखाते पीपे के पुल पर घमासान, गोश्त की कटाई हो या गेंदे के फूल से लदे नेता। और इन सबको एक धागे में जोड़ते फिल्म के डायलॉग, जो तमाम गालियों के बावजूद शीलता को नकली साबित करते हैं और इसीलिए खरे लगते हैं। अनुराग ने औरों के साथ खुद अपने लिए भी बार बहुत ऊंचा उठा दिया है।
- फिल्म एक और हिस्से में जाती है, यानी सीक्वेल आएगा, मगर अधूरेपन के साथ खत्म नहीं होती। और इसी क्लाइमेक्स की वजह से हम कह सकते हैं कि ये इंडिया की गॉड फादर है।

शुक्रवार, जून 08, 2012

फिल्म रिव्यू शंघाई, जबरदस्त पॉलिटिकल थ्रिलर



सौरभ द्विवेदी
साढ़े तीन स्टार

हमेशा शिकायत रहती थी कि एक देश भारत, और उसका सिनेमा खासतौर पर बॉलीवुड ऐसा क्यों है। ये देश है, जो आकंठ राजनीति में डूबा है। सुबह उठकर बेटी के कंघी करने से लेकर, रात में लड़के के मच्छर मारने की टिकिया जलाने तक, यहां राजनीति तारी है। मगर ये उतनी ही अदृश्य है, जितनी हवा। बहुत जतन करें तो एक सफेद कमीज पहन लें और पूरे दिन शहर में घूम लें। शाम तक जितनी कालिख चढ़े, उसे समेट फेफड़ों पर मल लें। फिर भी सांस जारी रहेगी और राजनीति लीलने को। ये ताकत मिलती है आदमी को सिनेमा से। ये एक झटके में उसे चाल से स्विट्जरलैंड के उन फोटोशॉप से रंगे हुए से लगते हरे मैदानों में ले जाती है। हीरो भागता हुआ हीरोइन के पास आता है, मगर धड़कनें उसकी नहीं हीरोइन की बेताब हो उठती-बैठती दिखती हैं कैमरे को। ये सिनेमा, जो बुराई दिखाता है, कभी हीरोइन के पिता के रूप में, कभी किसी नेता या गुंडे के रूप में और ज्यादातर बार उसे मारकर हमें भी घुटन से फारिग कर देता है। मगर कमाल की बात है न कि आकंठ राजनीति में डूबे इस देश में सिनेमा राजनैतिक नहीं हो सकता। और होता भी है, मसलन प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में, तो ये चालू मसालों में मसला हुआ लगता है।

शंघाई सिनेमा नाम के शहर में पहनी गई सफेद चादर है। कोरी, बाजार की नीयत से कदाचित बची और इसीलिए ये राजनीति की कालिख को भरपूर जगह देती है खुद में। इसमें दाग और भी उजले नजर आते हैं। और ये तो इस फिल्म के डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी की अदा है। खोसला का घोसला, लव सेक्स और धोखा में यही सब तो था, बस रिश्तों, प्यार और मकान की आड़ में छिपा। इस बार पर्दा खुल गया, लाइट जल गई और सब कुछ नजर आ गया। शंघाई पीपली लाइव का शहरी विस्तार है। वहां विकास खैरात में पहुंचता है और यहां सैलाब के रूप में। हर भारत नगर नाम की गंदी बस्ती को एक झटके में चमक के ऐशगाह में, कंक्रीट के बैकुंठ लोक में तब्दील करने की जिद पाले। इसमें सब आते हैं बारी बारी, अपने हिस्से का नंगा नाच करने। कुछ ब्यूरोक्रेट, नेता, भाड़े के गुंडे, उन गुंडों के बीच से गिरी मलाई चाटने को आतुर आम चालाक आदमी और व्यवस्था से लगातार भिड़ते कुछ लोग, जिन्हें बहुमत का बस चले, तो म्यूजियम में सेट कर दिया जाए। मगर फिल्म अंत तक आते आते सबके चेहरों पर वैसे ही कालिख पोतती है, जैसे फिल्म की शुरुआत में एक छुटभैया गुंडा भागू एक दुकानदार के मुंह पर मलता है। ये बिना शोर के हमें घिनौने गटर का ढक्कन खोल दिखा देती है, उस बदबू को, जिसके ऊपर तरक्की का हाईवे बना है।

क्यों देखें ये फिल्म

- जबदस्र्त कास्टिंग के लिए। इमरान को जिन्होंने अब तक चुम्मा स्टार समझा था, वे उसके कत्थे से रंगे दांत और तोंद में फंसी चिकने कपड़े की शर्ट जरूर देखें। उसका दब्बूपन देखें। सिने भाषा का नया मुहावरा गढ़ते हैं वह। अभय ने कंपनी के पुलिस कमिश्नर बन मोहनलाल की याद दिला दी। इस तुलना से बड़ी शाबासी और क्या हो सकती है उनके लिए। सुप्रिया पाठक हों या फारुख शेख, सबके सब अपने किरदार की सिम्तें, चेहरे और डायलॉग से खोलते नजर आते हैं। इससे फिल्म को काली सीली गहराई मिलती है, जिसके बिना इसकी अनुगूंज कुछ कम हो जाती। कल्कि एक बार फिर खुद को दोहराती और इसलिए औसत लगी हैं। पित्तोबाश के बिना ये पैरा अधूरा होगा। भागू का रोल शोर इन द सिटी की तर्ज पर ही गढ़ा गया था, फिर भी इसमें ताजगी थी।

- फिल्म की कहानी 1969 में आई फ्रेंच फिल्म जी से प्रेरित है। ये फ्रेंच फिल्म कितनी उम्दा और असरकारी थी इसका अंदाजा इससे लगाएं कि इसे उस साल बेस्ट फॉरेन फिल्म और बेस्ट पिक्चर, दोनों कैटिगरी में नॉमिनेशन मिले थे। बहरहाल, फिल्म सिर्फ प्रेरित है और भारत के समाज और राजनीति की महीन बातें और उनको ठिकाना देता सांचा इसमें बेतरह और बेहतरीन ढंग से आया है। डायलॉग ड्रैमेटिक नहीं हैं और सीन के साथ चलते हैं।

- कैमरा एक बार फिर आवारा, बदसलूक और इसीलिए लुभाता हुआ है। फर्ज कीजिए कुछ सीन। डॉ. अहमदी अस्पताल में हैं। उनकी बीवी आती है, वॉल ग्लास से भीतर देखती है और उसे ग्लास पर उसे अपने पति के साथ उसके  एक्सिडेंट के वक्त रही औरत का अक्स नजर आता है। या फिर एक लाश किन हालात में सड़क किनारे निपट अकेली खून बहाती है, इसे दिखाने के लिए बरबादियों को घूमते हुए समेटता कैमरा, जो कुछ पल एक बदहवास कॉन्स्टेबल पर ठिठकता है और फिर उस नाली को कोने में जगह देता है, जहां एक भारतीय का कुछ खून बहकर जम गया है।

- फिल्म का म्यूजिक औसत है। अगर अनुराग की भाषा में कहें, तो दोयम दर्जे का है। भारत माता की जय के कितने भी आख्यान गढ़े जाएं, ये एक लोकप्रिय तुकबंदी भर है, दुर्दैव के दृश्य भुनाने की भौंड़ी कोशिश करती। इसमें देश मेरा रंगरेज रे बाबू जैसी गहराई नहीं। इंपोर्टेड कमरिया भी किसी टेरिटरी के डिस्ट्रीब्यूटर के दबाव में ठूंसा गाना लगता है। विशाल शेखर भूल गए कि इस फिल्म के तेवर कैसे हैं। दिबाकर को स्नेहा या उसी के रेंज की किसी ऑरिजिनल कंपोजर के पास लौटना होगा।

क्या है कहानी

किसी राज्य की सत्तारूढ पार्टी भारत नगर नाम के स्लम को हटाकर वहां आईटी पार्क बनाना चाहती है। वहां प्रसिद्ध समाज सेवक डॉ. अहमदी पहुंचते हैं गरीबों को समझाने कि विकास के नाम पर उनसे धोखा किया जा रहा है। सत्ता पक्ष को ये रास नहीं आता और अहमदी को जान से मारने की कोशिश होती है। राजनीति शुरू होती है, जिसके घेरे में आते हैं करप्शन के नाम पर जेल में फंसे जनरल सहाय की बेटी शालिनी, चीप फोटोग्राफर जग्गू और इस मामले की जांच करते आईआईटी पासआउट आईएएस ऑफीसर कृष्णन। कौन आएगा लपेटे में और क्या होगा आखिर में, इसके लिए आप फिल्म देखें और दुआ दें कि ठीक किया नहीं बताया कि आखिर में क्या है।


शनिवार, दिसंबर 10, 2011

फॉर्मूला वर्सेस एंटरटेनमेंट

दो बातें याद आ रही हैं। एक पिछले हफ्ते आई डर्टी पिक्चर का
डायलॉग, फिल्म सिर्फ तीन चीजों से चलती है एंटरटेनमेंट,
एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट। दूसरी बात कुछ महीने पुरानी है।
भास्कर ऑफिस नो वन किल्ड जेसिका के डायरेक्टर राजकुमार
गुप्ता आए थे। उन्होंने कहा था कि मैं नहीं चाहता कि मेरी दूसरी
फिल्म देखकर लोगों को पहली की और तीसरी देखकर दूसरी फिल्म की
याद आए।

लेडीज वर्सेस रिकी बहल देखकर बार-बार बैंड-बाजा-बारात की याद
आती है। और इस याद के साथ ध्यान आता है यशराज फलसफा,
एंटरटेनमेंट और स्टाइल का फॉर्मूला। मगर इसके साथ वर्सेस में
है नयापन, जो इस फिल्म से मिसिंग है। लेडीज वर्सेस रिकी बहल जिसे हम
शॉर्ट में एलवीआरवी कहेंगे, फर्स्ट हाफ में कुछ गुदगुदाती है
थैंक्स टु हबीब फैजल के लिखे विटी और करारे डायलॉग, मगर
सेकंड हाफ दोहराव से भरा और बोरिंग लगता है। इसमें राहत के
नाम पर सिर्फ रणवीर की सर्फिंग के दौरान और बाद दिखाई गई
मैटेलिक शेड बॉडी और अनुष्का शर्मा का खूबसूरत बिकनी सीन ही
है। एलवीआरवी देखिए, अगर देखने को कुछ और नहीं है और वाकई
टाइम पास के लिए पस्त हुए जाते हैं।

कुछ चुके हुए फॉर्मूले

शाद अली की फिल्म थी बंटी-बबली। रानी की एंट्री होती है
धड़क-धड़क धुंआ उठाए रे गाने से। एलवीआरवी में अनुष्का मुंबई
की गलियों में बच्चों के साथ क्रिकेट खेलती हैं, गाना गाती हैं,
फिर प्लेटफॉर्म पर डब्बे वालों के साथ ठुमके लगाती हैं। यहीं से
फिल्म की कहानी खिंचने लगती है। उससे पहले फस्र्ट हाफ में भी
रणवीर मैं हूं आदत से मजबूर गाने में रैप की रेग्युलर हो चुकी
स्टाइल दिखाते हैं। इसी तरह लास्ट में ग्रैंड स्टेड पर नीली-लाल
रोशनी के बीच पार्टी गाना और उसके दौरान रणवीर-अनुष्का का
लिपलॉक हो या फिर दिल्ली की लड़की डिंपल के बहाने वहां के
सिग्नेचर टॉकिंग टोन के जरिए हंसाने की कोशिश, नयापन मिसिंग
ही रहता है।

कॉनमैन को जब प्यार आता है, तो धूम2 के ऋतिक और ऐश आने लगते
हैं, जहां एक तरफ प्रफेशनल कमिटमेंट है, तो दूसरी तरफ
प्यार। वहां तो फिर भी चोरी का रोमांच है, यहां तो मामला लैट
ही है। इस फिल्म की स्टोरी लिखी है आदित्य चोपड़ा ने, जिनका बैनर
पहले बंटी और बबली और धूम फ्रेंचाइजी बना चुका है। यकीन नहीं
आता कि इसी आदी ने इस देश को मुहब्बत का नया मुहावरा डीडीएलडी
और मुहब्बतें के जरिए दिया था। स्टोरी रुटीन थी, तो फिर मनीष
शर्मा का डायरेक्शन या फिर हबीब के डायलॉग कितना खींचते।
अमिताभ भट्टाचार्य के गाने भी बहुत कमाल नहीं दिखा पाए। शायद फिल्म
की टोन ध्यान में रखकर उन्हें हल्के मिजाज के गाने लिखने को कहा
गया हो। मगर सिंपल शब्दों में हर एक फ्रेंड जरूरी होता है भी तो
उन्होंने ही लिखा है न।

तो कुछ अच्छा भी है क्या

एक पुराना फॉर्मूला इस बार भी अच्छा लगा है। थोड़ी चब्बी और
पंजाबी बिजनेसमैन की बेटी यानी डिंपल चड्ढा के रोल में परणीति
चोपड़ा कमाल करती हैं। फस्र्ट हाफ में उनकी वजह से फ्रेशनेस
बनी रहती है। इसके अलावा शार्प बिजनेस मैनेजर के रोल में दीपानिता
शर्मा भी ठीक लगी हैं।

बाकी सो कॉल्ड सितारों की बात करें, तो अनुष्का को अब ट्रैक
बदलने की जरूरत है। माना कि बबली गर्ल के रोल में वह बेहतर
करती हैं, मगर उसके बाद क्या। और रणवीर इमोशनल सीन में फनी
लगते हैं और एक्टिंग के लिहाज से इससे ज्यादा फूहड़ बात कुछ
नहीं हो सकती। रिकी बहल का किरदार बिट्टू शर्मा का वानाबी
अवतार ही लगता है। मगर रणवीर जी, हम सिनेमा हॉल में वॉलपेपर
नहीं, फिल्म देखने जाते हैं, जो मजेदार हो। इस बार पइसा फुल्टू
वसूल नहीं हुआ रणवीर-अनुष्का और मनीष-हबीब की जोड़ी से।

शनिवार, नवंबर 12, 2011

जॉर्डन का जादू जबर्दस्त

सौरभ द्विवेदी
ऐसा कब होता है कि फिल्म के आखिरी शॉट के बाद, टाइटल खत्म होने के बाद, हॉल की लाइट्स जलने के बाद भी यंगस्टर्स एक इंतजार में स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहें। इस इंतजार में अफसोस नहीं, एक ख्वाहिश हो, कि शायद कुछ फिल्मी हो जाए। मगर ऐसा नहीं होता और यहीं रॉक स्टार हिंदी फिल्म के दायरे को कुछ बड़ा कर देती है। अंत के नाम पर आता है सरसों की डंडी पर रेशम सा लिपटा गाना तुम हो और रूमी की पंक्तियां - हम उस दुनिया में मिलेंगे, जहां पाप नहीं, पुण्य नहीं, बिछुडऩे का डर और वजह नहीं। संगीत, पागलपन, क'चापन, मासूमियत, मजाक और हां इन सबके साथ और बिना भी घ्यार, रॉक स्टार एक पेंडुलम से झूले पर बिठा ढाई घंटे में इन सब एहसासों के साथ सहलाती घुमाती है।

रॉक कर देंगे
स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली का सबसे हेप क्राउड, नायिका हीर कौल दोस्तों के साथ बैठी है और पीतमपुरा का जाट जनार्दन जाखड़ उसके पास पहुंचता है। हाथों को क्रॉस करते हुए लहराता है और एक पैर उठा बोलता है, दोनों मिलकर रॉक कर देंगे। फिल्म में रणबीर रॉक से भी 'यादा रॉक करते हैं। भूल जाइए, टॉवल गिराकर किशोर कामनाएं जगाने वाले सांवरिया को, भूल जाइए वेक अप सिड के कन्फ्यूज मगर क्यूट युवा को, भूल जाइए प्रकाश झा की राजनीति के व्यूह रचते आधुनिक अर्जुन को, ये जाखड़ जिसे उसका घ्यार और संगीत जॉर्डन नाम बख्शता है, एक नए तिलिस्म को रचता है पर्दे पर। मिडल क्लास का बेढब फैशन, धारी और जाली वाले हाथ के बुने स्वेटर, उसके ऊपर डेनिम जैकेट, आवाज को आरोह-अवरोह के भंवर में फंसाए बिना संवाद अदायगी और संगीत के जुनून को स्याहपन बख्शती गाढ़ी दाढ़ी। माइक पर रणबीर की चीख कहीं दूर तक अंदर आपके अंदर गुम हो गूंजती रहती है। उन्होंने फस्र्ट हाफ में हिंदू कॉलेज के कुछ अनजान, कुछ सनकी-पागल युवा को ठीक वैसे ही जिंदा किया है, जैसा रियल लाइफ में इस कॉलेज में पढ़े इम्तियाज अली ने सोचा होगा। सेकंड हाफ उनसे डार्क होने की उम्मीद करता है, यहां चीख हैं, स्टेज पर भीड़ से घिरा होने पर भी अकेले होने की त्रासदी है । इन सबके ऊपर बादलों सा घिरा स्कार्फ सा इर्द गिर्द उड़ खुशबू बिखेरता घ्यार है।

और बाकी सब
नरगिस फाखरी की एक्टिंग वैसी ही है, जैसे आप हल्का सा मुंह खोले बैठे हों और कोई जीभ के किनारे एक छिला हुआ आंवला छुआ दे। एक खट्टी सी गुदगुदी जो रीढ़ की हड्डी से तलुए तक लहर पैदा
करती है। वह खूबसूरत दिखी हैं, यह कहना औसत कथन होगा। उन्होंने उम्मीद से कहीं 'यादा अ'छी एक्टिंग की है और इसका श्रेय अली के साथ उन्हें भी जाता है। कुछ छोटे मगर जरूरी रोल इस गाढ़े किस्से को और स्वाद बख्शते हैं। कैंटीन वाले के रोल में कुमुद मिश्रा, म्यूजिक कंपनी के मालिक के रोल में पीयूष मिश्रा, जर्नलिस्ट के रोल में अदिति राव ऐसे ही कुछ नाम हैं।

आगे बढ़ो, पीछे लौटो, फिर आगे बढ़ो
ये इम्तियाज अली के कहानी सुनाने का तरीका है। फिल्म बीच से शुरू होती है, कई बार शुरू से भी, फिर जंप मारती है, कभी बैक, कभी फॉरवर्ड। ये मूवमेंट कहीं भी खटकता नहीं, बल्कि एक अलग किस्म का जुड़ाव खिंचाव पैदा करता है। ऐसा जब वी मेट में हुआ, लव आजकल में भी हुआ और यहां भी है। इसके अलावा कन्फ्यूजन या हां और न की ठिठक उनके यहां प्रेम के पलने के दौरान केंद्रीय भाव होती है। इसकी शुरुआत उनकी पहली फिल्म सोचा न था से होती है और अभी तक ऐसा हो रहा है। हीर कहीं ठिठकी है ये कहने में कि जॉर्डन इसकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है, जनार्दन भी रेलिंग पर इंतजार करता सा है और जब दोनों चादर के नीचे की सफेद दुनिया में ये कबूलते हैं, फिल्म एक पीले बुखार में आने वाली नींद सी मीठी हो जाती है।
कहानी के अलावा फिल्म के डायलॉग भी सुरीले और जोशीले हैं, कहीं आपको आदी बनाते, कहीं अदा दिखाते। अ'छा ये रहा कि नरगिस के हिस्से 'यादा हैवी डायलॉग्स नहीं एक जर्द खामोशी आई, जिसमें सूनापन ही अलग-अलग शेड्स लिए था।
रॉकस्टार मैं कुछ एक बार और देख सकता हूं, और यकीन है कि आप भी पहली बार देखने के बाद यही सोचेंगे। इसकी वजह है तमाम तहों में छुपा मगर फिर भी नुमायां होता है वो नूर, जिसे घ्यार कहते हैं।

शनिवार, सितंबर 17, 2011

गुनगुनाना गुलाम अली का

फिल्म खुशियां के म्यूजिक रिलीज पर आए गायक गुलाम अली। उनके नाम के साथ कोई विशेषण जोडऩा उस शब्द को इज्जत बख्शना है, इस शख्स को नहीं। ठीक उसी तरह से गुलाम अली ने बुधवार शाम तमाम सवालों के जवाब में जो कहा, उसके सिलसिले के बीच में आना गुनाह की तरह है। इसलिए आज आप सुरीले गुलाम अली साहब के ख्याल सुनिए। बीच में आपको सिर्फ यह बताया जाएगा कि किस सवाल के जवाब में ये सुर फूटे।
मैं किस भाषा में बोलूं, उर्दू या पंजाबी, अच्छा पंजाबी में ही बात करते हैं। वैसे भी जबान का क्या, आप लोग इतने समझदार हैं।
हम आर्टिस्ट को आप जैसे समझदार सुनने वाले ही चाहिए। समझ के साथ सुनना भी बहुत सुरीला काम है। जस्सी (फिल्म खुशियां के हीरो जसबीर जस्सी) मेरे छोटे भाई की तरह हैं। इन्होंने कहा कि खां साहब जरूर चलना है। मैंने कहा, भाई खां साहब का तो पता नहीं, मगर चलना जरूर है।
जिंदगी की हर चीज में लय चाहिए होती है। गाड़ी हो या गाना टेंपो सही होना जरूरी है। मैं गजल गाता हूं, जो उर्दू जबान के सहारे चलती है। मगर मेरी मादरी जबान पंजाबी है। आज से 50 साल पहले मैंने अपना करियर रेडियो पाकिस्तान के लिए दिल पे लुट देआ गाकर किया था।फिर गजल की तरफ ड्यूटी लग गई, तो पंजाबी गाना काफी कम हो गया। मगर मेरी मां कहती थी कि पंजाबी में जरूर गाना है। कई बार बोलती, ओन्हूं सद्दो, जेड़ा वड्डा खां साहब बणया फिरदा है।मैं पूछता, अम्मा जी क्या सुनाना है। तो मां कहती, नित दे विछोड़े, सारा सुखचैन खो गया सुना। मैं माई को देखता रहता और गाता रहता। हर मां अपने बेटे से बेपनाह मुहब्बत करती है, मगर जब बच्चा कुछ मशहूर हो जाए, तो माई को और प्यार आता है। उस वक्त वैसा ही कुछ हो रहा था। देखिए कितना अच्छा रहा कि बातों के सिलसिले में मां का जिक्र आ गया। उसकी दुआ के बिना सबकुछ अधूरा रहता है।
सियासत का सवाल...
(पिछले दिनों राहत फतेह अली खान को लेकर दिल्ली एयरपोर्ट पर कुछ मसला हुआ, उस दौरान पाकिस्तान में तमाम राजनेताओं ने बयानबाजी की, उससे कैसे प्रेशर कायम हुए आप कलाकारों पर...)
जिदबाजी है ये सब। प्यार तो सुर से सुर जोड़ता है। उन सियासत वालों की सुनने लगे, तो सुर गुम जाएगा। मगर हां, मेरा मानना है कि कलाकारों को कुछ रियायतें तो मिलनी ही चाहिए। मगर ठीक उसी वक्त मेरा इस बात पर भी जोर है कि फनकारों को हर मुल्क के कानूनों की कद्र करनी चाहिए।
जगजीत सिंह के साथ जुगलबंदी
पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में उनके साथ जुगलबंदी की। जगजीत साहब मेरे दोस्त हैं, भाई हैं और बहुत बड़े फनकार हैं। मैं मामूली सा एक कलाकार हूं। आप लोगों का प्यार है, जो इतनी इज्जत बख्श देते हैं। अपने लिए तो बस वही याद आता है कि किधर से आया, किधर गया वो, अजनबी था...
गजल की किस्मत
हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान में भी गजल गाने वाले कम हुए हैं। मगर मेरा यकीन है कि जब तक सुनने वाले हैं, गजल तो क्या कोई भी कला खत्म नहीं हो सकती। मैं अभी अमेरिका से कॉन्सर्ट कर लौटा। कई लोग थे, जिन्हें गाए हुए के माने समझ नहीं आ रहे थे, मगर वे इसका पूरा आनंद ले रहे थे। 55 साल से गा रहा हूं और कभी नहीं लगा कि अब रुक जाना चाहिए। ये हौसला सुनने वालों से ही तो मिलता है।
मेरा फलसफा किस गजल में
(प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस सवाल पर गुलाम साहब ठहर गए और फिर बोले मेरा सच्चा सुर कहां बसता है, ये बाद में बताऊंगा। मगर बाद में गुफ्तगू के दौरान उन्होंने दिल के कुछ और दरवाजे खोले और इस सवाल का भी जवाब दिया...)
ये गजल मैं मंच पर बहुत कम ही गाता हूं। मगर जेहन के बड़े करीब है। आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक। इसके अलावा मेरे सबसे अजीज शायर नासिर काजमी साहब की लिखी दिल में एक लहर सी उठी है अभी। इसके अलावा तमाम नामचीन शायर हैं, जिनका लिखा तसल्ली बख्शता है। गालिब, जौक, फराज, फैज और आज के दौर में बशीर बद्र, राहत इंदौरी।
मेरे लिए गाने से पहले लफ्ज की अदायगी समझना और उस पर यकीन करना खासा जरूरी है। वीराने में ये सुर आबाद नहीं होते। इसलिए मैं जो भी गजल गाता हूं, वो मेरे दिल के करीब होती ही है।
मेरे गुरु की नसीहत
(सवाल ये था कि गुलाम अली साहब किसके मुरीद हैं और वह कौन सी सीख है उनकी, जो आज भी जेहन में दर्ज है...)
मरहूम बरकत अली खान साहब और बड़े गुलाम अली खां, इन्हीं से सीखा है सबकुछ। बड़े गुलाम अली खां साहब की तरह मैं भी पटियाला घराने से ताल्लुक रखता हूं। उनकी हर बात एक सबक की तरह थी। वह कहते थे आराम से गाना हमेशा। हाल बुरा हो, तो सुर अच्छे नहीं रहेंगे। इस बात की चिंता मत करना कि चेहरे पर कैसे भाव आ रहे हैं, हाथ कितने हिल रहे हैं। जब मैं ही हंसकर नहीं गाऊंगा, तो मेरे सुर कैसे मुस्कराएंगे। जब भी स्टेज पर चढ़ता हूं, यह याद रखता हूं।
कोक स्टूडियो और म्यूजिक संग हो रहे दूसरे प्रयोगों पर...
मुझे भी इसके लिए अप्रोच किया गया था, मगर वक्त नहीं निकाल पाया। बहुत अच्छा है ये सब देखना। मेरा साफतौर पर मानना है कि संगीत के साथ किया गया कोई भी प्रयोग उसकी बेहतरी की तरफ एक कदम है। कुछ न कुछ तो कर ही रहे हैं न ये नौजवान। मेरा पूरा समर्थन है, इस तरह की मुहिम को।
वो एक वाकया
एक बार कोलकाता में गा रहा था। तमाम फऱमाइश के बीच मैंने कहा कि आपको पंजाबी में कुछ सुनाता हूं। पसंद नहीं आएगा, तो बीच में ही खत्म कर दूंगा। फिर उन्हें जदो मी मेरा माइया रुसया सुनाया। आप यकीन नहीं करेंगे, उन लोगों ने इसे तीन बार सुना। तो ऐसा है निराला हिंदुस्तान और यहां के सुरीले लोग।
पाकिस्तान के हालात
हर जगह वहशीपन है, खराब हालात हैं। हम तो बस दुआ करते हैं और हर जगह गाते हैं क्योंकि सुर हौसला देते हैं।

बुधवार, अगस्त 31, 2011

ब्रेन गार्ड चाहिए बॉडीगार्ड देखने के लिए

सौरभ द्विवेदी
एक स्टार
एक हीरो थे, अब लगातार फ्लॉप दे रहे हैं, इसलिए एक्टर हो गए हैं, नाम है अक्षय कुमार। उन्होंने दो एक साल पहले बैक टु बैक कई सुपरहिट फिल्में दीं। उन्हें और उनसे ज्यादा प्रॉड्यूसर्स को लगा कि फॉम्र्युला मिल गया है। उसके बाद अक्षय एक हिट के लिए तरस रहे हैं। मगर बॉडीगार्ड तो सलमान खान की फिल्म है, तो फिर अक्षय का जिक्र क्यों। आज मुझे लगा कि सलमान भी उसी रास्ते पर जा रहे हैं या कहें कि धकेले जा रहे हैं। वॉन्टेड, दबंग, रेडी के खुमार में डूबकर अगर ऐसी ही फिल्में वह करते रहे तो उनकी स्टार पावर पास्ट टेंस की चीज बन जाएगी। बॉडीगार्ड में एक भी नया थॉट, डायलॉग या स्टोरी पॉइंट नहीं है। जब फिल्म खत्म होने को आई तो डायरेक्टर सिद्धीक को क्रिएटिविटी की सूझी और उन्होंने क्लाइमेक्स में कहानी के साथ ऐसे खिलवाड़ किए कि आपकी कल्पना कराहती नजर आई।
आज रेग्युलर रिव्यू नहीं, आप तो बस फिल्म के कुछ फॉम्र्युलों के बासीपन पर उदाहरण सहित नजर फरमाएं।
सलमान की एंट्री : असली शॉट ट्रांसपोर्टर 2 से लिया गया। हीरो अपने एंट्री शॉट में बहुत सारे गुंडों की धुलाई करता है और बीच-बीच में कॉमिक सिचुएशन पर गुंडों समेत हंस भी लेता है। इस शॉट को प्रभु देवा ने वॉन्टेड में सलमान की एंट्री के लिए यूज किया। अभिनव कश्यप ने दबंग में यूज किया और अब सिद्दीक ने बॉडीगार्ड में यूज किया। मकसद 1, पब्लिक को ये बताना कि तुम्हारा नायक बिना किसी नखरे के कितनों की धुलाई कर सकता है। मकसद 2, सलमान के बदन से शर्ट नाम की चिडिय़ा को हट्ट-हुर्र करके उड़ाना। मकसद 3, आगे की फिल्म की टोन सेट करना।
सलमान की एंट्री का गाना : माफ कीजिए सलमान पर फिर लौट रहा हूं क्योंकि फिल्म उनके मजबूत बदन पर टिकी है।औसत फिल्म मगर सल्लू के फेर में अच्छी ओपनिंग पाई फिल्म रेडी याद है आपको। उसका गाना ढिंका-चिका की मस्ती को फ्लैशबैक से वापस लाइए। अब एक गाना सोचिए जो मस्त हो, मगर हुड़ दबंग-दबंग वाले वीर रस से भरा हो। आओ जी-आओ जी... आ गया है देखो बॉडीगार्ड गाना तैयार है। डोले फड़काते स्लीवलेस शर्ट पहने सलमान, उनके इर्द-गिर्द भुजाएं फड़काते, दंड पेलते तमाम नौजवान। अभी सिंघम में भी कुछ ऐसा ही था न।
हीरो के साथ जोकर : एक कार्टून नायक के इर्द-गिर्द ताकि फिल्म का कॉमेडी वाला कोटा पूरा किया जा सके। वॉन्टेड में ये काम मनोज पाहवा ने किया था। जानू जानू बोलकर, फनी कपड़े पहनकर और आयशा टाकिया के आसपास घूमकर। बॉडीगार्ड में रजत रवैल ने सुनामी सिंह का किरदार निभाया है, जो मोटा है मगर मजाकिया नहीं। जब उसके डायलॉग नहीं हंसा पाते, तो डायरेक्टर उन्हें गल्र्स के कपड़े पहनाने और फिर गल्र्स से पिटवाने का उपक्रम भी कर लेते हैं, मगर हंसी, वो तब भी पराई ही बनी रहती है।
कुछ खास आवाजें और एक पंच लाइन : जब मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं, तो अपनी भी नहीं सुनता, भइया जी स्माइल जैसे पंच लाइन की तर्ज पर इस फिल्म में डायलॉग है मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना। इसके अलावा सलमान के किरदार लवली सिंह की एक खास रिंगटोन और हर बार फोन बजने पर उनका कूल्हों को पुश करके चौंकना बेढब लगता है।
करीना कॉकटेल में फंसीं : कभी खुशी कभी गम में करीना का एंट्री शॉट याद करिए। इट्स रेनिंग...की तेज बीट, मस्कारा और लिपस्टिक लगातीं, चमकीली ड्रेस पहनतीं करीना। अब जब वी मेट की करीना यानी गीत को याद करिए। शानदार चटख कंट्रास्ट के कुर्ते पहनने वाली शोख नायिका।इन दोनों को मिला दीजिए। बॉडीगार्ड में करीना यानी दिव्या की एंट्री हाजिर है। इसके अलावा जब लवली और दिव्या की लव स्टोरी डायरेक्टर के हिसाब से गहरे भंवर में फंस जाती है, तब एक गाना शूट होता है। इस गाने के लिए उन्होंने मैं हूं न की सुष्मिता को, दे दना दन में अक्षय कटरीना के गाने को और थ्री इडियट्स के जूबी डूबी गाने में साड़ी में लिपटी करीना को बार-बार देखा और गाना बना दिया।
कुछ और फॉम्र्युले बाकी हैं अभी : वफादारी बहुत बड़ा मूल्य है। सिनेमा के पर्दे पर जैसे तस्वीरें बड़ी दिखती हैं ये मूल्य भी मैग्निफाई हो जाता है। उसी के इर्द-गिर्द है बॉडीगार्ड की कहानी। लवली सिंह के मां-बाप को सरताज सिंह राणा (राज बब्बर) ने बचाया, लवली उनका एहसानमंद है। अब लवली को उनकी बेटी दिव्या को बचाना है। मगर दिव्या को लवली से प्यार हो जाता है। यहीं से मुश्किल शुरू होती है। बॉडीगार्ड मालिक की बेटी से कैसे प्यार कर सकता है। यही है कहानी फिल्म की।यहां रुककर नाइनटीज में आई फिल्म बंधन को याद करिए। जो जीजा जी बोलेंगे, मैं करूंगा बोलते सलमान खान। यहां इसी रट के साथ प्रकट हुए, कि मैडम आई एम योर बॉडीगार्ड। कोई कुछ कैसे कर सकता है।
इसके अलावा स्टोरी आगे बढ़ाने के लिए इसमें कभी खुशी कभी गम की तरह मर चुकी साइड एक्ट्रेस है, जिसका बच्चा, मां की डायरी पढ़कर अपने पापा की लव स्टोरी के बारे में जानता है। फिर पापा को उनके असली प्यार से मिलवाता है। इसके अलावा गाने की और एक्शन की ऐसी-ऐसी सिचुएशन हैं, जिनका तर्क से नहीं तकलीफ से लेना देना है। फिल्म पूरा देखने की तकलीफ। बॉडीगार्ड देखने के लिए ब्रेन गार्ड चाहिए।