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बुधवार, जुलाई 07, 2010

लोगों के घर में रहता हूं कब मेरा अपना घर होगा

रुकिए और एक बार फिर से हेडिंग पढि़ए। बड़ी पुरानी गजल है, दिमाग में पता नहीं कब अटक गई और अब तो चौबीसों घंटे यही लाइन नगाड़े बजा रही है। मेरे मकान मालिक ने नोटिस दे दिया। घर खाली कर दो, महीने के आखिरी तक। दुबई से उनकी बेटी अपनी फैमिली के साथ रिसेशन की वजह से वापस लौट रही है। जब मैंने अपने फ्लैटमेट मंकू जी को सुबह सवेरे ये खबर सुनाई कि घर खाली करना है, तो उनका चेहरे हारे हुए जुआरी जैसा दिख रहा था, जिसके पास अब जुए के अड्डे तक जाने के भी पैसे न बचे हों।
कितना कुछ था इस हफ्ते आपको बताने के लिए। रेनू आंटी और बेस्ट फ्रेंड गुंजन के साथ पटियाला गया था। भाभी की शादी के लिए शॉपिंग करने। उनके लिए फुलकारी वाली साड़ी, सूट और परांदा खरीदा। फिर उसके बाद सनावर हिल्स की ट्रिप की खबर देनी थी। मेरा दोस्त विक्रम ले गया, बारिश से भीगी पहाड़ी के टॉप पर। वहां पर बैठकर वॉटर फॉल के लिए मजे लिए। नहीं-नहीं पहाड़ी की चोटी पर कोई फॉल नहीं था, ये तो फ्रूट वाइन का नाम है। इसके अलावा एक पुराने दोस्त और फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप से लंबी गुफ्तगू हुई। मैंने उससे मजाक किया कि मेरी शादी हो रही है और तुम्हें जरूर आना है, सेंटी हो गया, बोला चाहे शूट रोकना पड़े आऊंगा। दोस्त भी ऐसी ही होते हैं न। वैसे उसने डांट भी खूब खाई। कम्बख्त छह महीने से सीन से गायब था।
मगर नहीं आज न तो डिटेल में पटियाला की कहानी सुनाऊंगा, न सनावर हिल्स की और न ही अनुराग की। आज कहानी उस दुखड़े की, जो मेरे जैसे हजारों बैचलर फेस कर रहे हैं, ठौर-ठिकाने की प्रॉब्लम। जब शहर आया था, तो दो बैग थे। फिर रेनू आंटी, वीरेंदर अंकल की मदद से घर जमाया। अमिताभ बच्चन की तरह कहने का दिल करता था कि आज मेरे पास फ्रिज है, कूलर है, किताबों और डीवीडी से भरी रैक हैं, जमा-जमाया किचेन है, तुम्हारे पास क्या है। मगर अब लगता है कि ठीक ही रहा किसी छड़े से ये नहीं कहा। सब कुछ है, मगर अब घर नहीं है। अंकल, आन्टी ने तो अपनी मजबूरी बता दी, बुजुर्ग हैं तो कुछ कह भी नहीं सकता, मगर मैं अपना गम कहां गलत करूं।
तो यारों पिछले कुछ दिनों से हम नए सिरे से घर तलाश रहे हैं। इस बार मकान लेने से पहले कुछ बातें भी साफ कर लेनी होंगी। इस मकान में जैसे ही दोस्त आते थे और उनमें लड़कियां भी होती थीं, तुरंत मकान मालिक आ जाते थे। तुम्हारी मम्मी आई हैं क्या, ये कौन हैं, अच्छा क्या काम करते हैं। फिर एक दिन मंकू जी से कहा, हमने पहले ही मना किया था कि लड़की नहीं आएगी। ऐसे साउंड करता था, जैसे कोई बहुत गलत काम कर दिया हो दोस्तों को बुलाकर। फिर अंकल आंटी ड्राइंग रूम में बिठाते और कहते, तुम तो हमारे लिए बेटे जैसे हो, हमें पूरा भरोसा है, मगर यहां मोहल्ले के लोग बातें बना सकते हैं, वगैरह-वगैरह। मैंने कह दिया कि समाज ने तो भगवान राम को भी नहीं छोड़ा और आ गया। खैर उसके बाद ये मुद्दा नहीं उठा क्योंकि फिर लड़कियां नहीं आईं। सब बस कहती ही रह गईं कि हाउस वॉर्मिंग पार्टी नहीं दी। अब क्या बताएंगे कि उनके नाम से ही घर में ग्लोबल वार्मिंग का असर दिखने लगता है।
अंकल आंटी बुजुर्ग थे, तो ज्यादा तेज आवाज में बात भी नहीं कर सकते थे। खैर, इसमें तो उनकी कोई गलती नहीं, हमें पहले ही इन सब बातों के बारे में सोच लेना चाहिए था। घर में खुला आंगन था और ग्राउंड फ्लोर था, तो लगा घर सही रहेगा। मगर अब घर किसी भी फ्लोर पर चलेगा। बस ये किसी के साथ शेयरिंग में नहीं होना चाहिए।

जब यहां शिफ्ट हुआ तो कई लोगों ने कहा कि अकेले हो, जमा-जमाया कमरा ले लो, फ्लैट के चक्कर में क्यों पड़े हो। सबने ये भी कहा कि छड़ों के साथ ये दिक्कतें आती ही हैं। मगर जिद थी और अभी भी कायम है कि फ्लैट ही लेंगे और फिर से सब नए सिरे से सेट करेंगे। बस यही दुआ करिए कि इस बार जल्दी खाली करने का नोटिस न देना पड़े और अपने सब दोस्तों को घर पर बुलाकर पार्टी दे सकूं। इन दोस्तों में लड़कियां भी शामिल हो सकें। तब तक मेरे लिए दुआ करिए कि एक छत मिल जाए, महीना खत्म होने से पहले। इस शहर की आंखों में ये एक सपना रोप रहा हूं, देखें सच होता है कि नहीं।
from my column, sahar aur sapna, the story of a bachelor in chandigarh, published in dainik bhaskar, city life

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