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रविवार, जुलाई 04, 2010

अनुराग कश्यप का सदियों पुराना कोट

कार में तकरीबन छह आठ लोग थे। आगे वाली सीट पर अपने सदियों पुराने क्रीम कलर के कॉड्राय कोट में अनुराग, पीछे कुछ असिस्टेंट और मैं। बात हो रही थी नो स्मोकिंग की। किसी ने कह दिया कि फलाने साहब कह रहे थे कि अनुराग कश्यप की फिल्में हमारे समय से 20 साल आगे की हैं, अनुराग ने हमारी तरफ मुड़कर कहा, नहीं समय मुझसे 20 साल पीछे चल रहा है, तो मैं क्या करूं। उस वक्त उनकी आंखों में अहंकार नहीं था, भदेस लहजा जरूर था और वो मुंबई में रहकर और सब कुछ गंवाने की हद तक जाकर पक्का होने से हुआ था।
यहां पर अनुराग को लेकर तमाम फतवे दिए जा रहे हैं। अच्छी बात है मोहल्ले में चोंपों न हो, तो पॉश कॉलोनी लगने लगती है। मैं सिर्फ अपनी बात कहना चाहता हूं।
कितने लोगों को पता है कि पांच के रिलीज न होने, ब्लैक फ्राइडे पर कोर्ट केस चलने और ऐसी ही तमाम वजहों की वजह से अनुराग की निजी जिंदगी की गांड़ लग गई थी। कितने लोगों को वो दिन और रातें याद हैं, जब अनुराग की पत्नी आरती काम करती थीं और अनुराग फ्लैट में शराब के साथ अपनी इस थोपी गई नाकामी को एकटक घूरते रहते थे। और फिर वो रात जब इसी सबके बीच उन्होंने नो स्मोकिंग का पहला ड्राफ्ट लिखा और बहुत सारे लोगों को मदद का मैसेज करके सो गए। जवाब दिया सिर्फ मैचो लुक और गंभीरता से परे रखकर देखे जाने वाले जॉन अब्राहम ने।
नो स्मोकिंग को लेकर हिंदी सिनेमा में बात होगी, मगर मुझे फिल्म से ज्यादा अनुराग की तकलीफ पर बात करनी है। बहनापा महसूस करता हूं। भाईचारा नहीं क्योंकि उसमें वो आत्मीयता नहीं। आत्मीयता कम से कम मैं औरतों के रूप में ही जी पाता हूं। बहरहाल जॉन ने जवाब दिया और फिल्म बनी। जब बाबा बंगाली के रोल के लिए पंकज कपूर से कहा गया, तो उनका जवाब था कि मुझे लगता है कि चीजों को दूसरे ढंग से भी, कहा जा सकता है। मगर अनुराग की जिद थी कि वो दूसरों के सपनों को नहीं जिएंगे। वर्ना अनुराग कश्यप की रिलायंस और अभिषेक बच्चन और मणि रत्नम से कोई दुश्मनी नहीं। न ही करण जौहर से। पहले झगड़ा हुआ झूम बराबर झूम की स्क्रिप्ट को लेकर। फिर गुरु की स्क्रिप्ट को लेकर। धीरू भाई ने जबरदस्ती अनुराग का खेत नहीं जोत लिया था। अनुराग बदलाव के खिलाफ थे, क्योंकि वो ईमानदारी से काम करना चाहते थे। तब मोहल्ले पैदा नहीं हुए थे और वहां बसर करने वाले नींद में थे।
ये सब हुआ और अनुराग को दलितों की तरह हाशिए पर डाल दिया गया। तो भइया दलित पर कौन बात करे और कैसे बात करे ये मुंबई के एक दलित को भी तय करने का हक है न।
नो स्मोकिंग के बाद अनुराग को हेल्थ मिनिस्ट्री ने अवॉर्ड दिया कि साहब आप बहुत महान हैं, कि आपने सिगरेट के खिलाफ फिलिम बनाई। अनुराग के चेहरे पर ट्रैजिक कॉमेडी के नायक के आखिरी शॉट वाले भाव थे। फिल्म सिगरेट के खिलाफ नहीं थी, फिल्म तो समाज की नैतिकता के जाल को तार तार कर रही थी। भयानक फंडू फिल्म है ये, मेरे आईआईटी में पढ़ रहे एक दोस्त ने कहा। और फिर हम दोबारा फिल्म से जूझने लगे।
जेएनयू में स्क्रीनिंग के दौरान अनुराग से पहली बार मिला। अगली सुबह हैबिटाट में मिला। उस आदमी ने खुद को उघाड़कर रख दिया। और हां इस वक्त भी वो वही सदियों पुराना कोट पहने थे। कितने स्टार और नॉन स्टार बचपन में हुए हादसों के बारे में बात करते हैं। कितने बताते हैं कि मेरे चाचा, मामा ने मुझे यहां सहलाया। क्या करें मैचो मर्द बनने की मार ही इतनी पड़ी है कि ये सब बताया नहीं जाता। मगर ये शख्स बोलता है बिना इस बात की परवाह किए कि यहां बोलना है, मगर सोच की शालीन तुरही पर अलापे राग की तरह।
नो स्मोकिंग फ्लॉप हुई थी, मगर अनुराग नहीं। फिर दिल्ली में देव डी की लोकेशन ढूंढ़ते वक्त भी बार बार बात हुई सिनेमा पर, समाज पर और तमाम चीजों पर। शाम को हम प्रगति मैदान भी गए। इस दौरान वह बार बार हिंदी में नई लिखी जा रही चीजों के बारे में जानकारी जुटाते रहे। जब मैदान से निकले तो उनके पास किताबों के तकरीबन 50 किलो के पैकेट होंगे। इसमें अरविंद कुमार का हिंदी कोष भी थी, दलित साहित्य भी और उदय प्रकाश भी। साथ में थे सुरेंद्र मोहन पाठक और अंग्रेजी में इसी तर्ज पर लिखे जा रहे कुछ नॉवेल। यही है अनुराग का पूरा सच। यहां शिंबोर्स्का के साथ पाठक और उदय के साथ निर्मल वर्मा को पढ़ा जाता है। और हां इस सबके के लिए रैक में अलग जगहें नहीं हैं। सब एक साथ ठुंसा हुआ है।
फिर अनुराग देव डी बनाने में जुट गए। फिल्म में मसरूफ थे, मगर उनकी बेटी आलिया की एक दिन की छुट्टी हुई, तो खुद उसे लेने मुंबई गए। आलिया आरती के पास रहती थी, मगर एक बाप के नाते उन्हें भी कुछ वक्त मिलता था। फिल्म के सेट के बाहर अनुराग ने हजारों सिगरेंटे फूंकी, बहस की, लाइट ठीक की और तमाम किरदारों को एक्टर्स से ज्यादा जिया। खैर इसमें कोई बहादुरी नहीं, हर डायरेक्टर ऐसा ही करता है, मगर मुझे शूटिंग की उन तमाम रातों और दिनों में यही लगा कि ये आदमी हारा और हताश नहीं है। कि अभी भी खिड़की से झांकते चेहरों में इसे जिंदगी नजर आती है।
ज्यादा तो नहीं जानता, मगर इतना जानता हूं कि अनुराग के यहां हिंदी और अंग्रेजी का फर्क भी नहीं है। पत्रकारों से पूछ लीजिए, जो टेक्स्ट मैसेज और ईमेल करके थक जाते हैं, मगर स्टार लोगों के जवाब नहीं आते। अनुराग इसके उलट लगे। इस फेहरिस्त में सुधीर मिश्रा, अंजुम राजाबाली और पीयूष भाई जैसे नाम भी शामिल किए जा सकते हैं। इन सबका भी यही कहना है कि सांड है ये आदमी। परवाह नहीं करता। अभी नई फिल्म दैट गर्ल इन येलो बूट्स की बात ही करें। सुधीर ने कहा कि उसने रशेज दिखाएं हैं, लाजवाब मूवी है, मगर दुनिया कमीनी है, वो पगले उत्साही बच्चे की तरह सबको फुटेज दिखा रहा है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
मगर अनुराग ऐसा कर रहे हैं। किसी को देवता लगे या दानव, मगर दो दो फिल्मों की एडिटिंग और तीन शिफ्ट में काम करने के बावजूद वो मोहल्ले में चहलकदमी कर रहे हैं, हां उनका वो कोट नजर नहीं आ रहा।
दोस्तों कोट बदला है, जिस्म नहीं। और इसके अंदर वही पगलाया सांड रहता है, जिसे खेत से खदेड़ दिया गया, जिसे चौराहे पर बैठने के अलावा कहीं ठौर नहीं मिला और अब जब तमाम कारों के, ख्यालों के रास्ते रुक रहे हैं, तो कोई हॉर्न बजा रहा है, कोई पुलिस को बुला रहा है और कोई ओह गॉड इतना भी सिविक सेंस नहीं बोल रहा है, तब यही सांड़ पूरी बेशर्मी और ईमानदारी के साथ, आंखें लाल किए पगुरा रहा है।
अनुराग तुम्हारी भाषा से मुझे कोफ्त होती है। क्योंकि हम सब शालीनता का कंडोम चढ़ाए सेफ वैचारिक सेक्स की तमन्ना लिए बैठे हैं खुद को सहलाते।

1 टिप्पणी:

अनुराग अन्वेषी ने कहा…

हर स्तर पर बेहद उम्दा