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Saturday, September 17, 2011

गुनगुनाना गुलाम अली का

फिल्म खुशियां के म्यूजिक रिलीज पर आए गायक गुलाम अली। उनके नाम के साथ कोई विशेषण जोडऩा उस शब्द को इज्जत बख्शना है, इस शख्स को नहीं। ठीक उसी तरह से गुलाम अली ने बुधवार शाम तमाम सवालों के जवाब में जो कहा, उसके सिलसिले के बीच में आना गुनाह की तरह है। इसलिए आज आप सुरीले गुलाम अली साहब के ख्याल सुनिए। बीच में आपको सिर्फ यह बताया जाएगा कि किस सवाल के जवाब में ये सुर फूटे।
मैं किस भाषा में बोलूं, उर्दू या पंजाबी, अच्छा पंजाबी में ही बात करते हैं। वैसे भी जबान का क्या, आप लोग इतने समझदार हैं।
हम आर्टिस्ट को आप जैसे समझदार सुनने वाले ही चाहिए। समझ के साथ सुनना भी बहुत सुरीला काम है। जस्सी (फिल्म खुशियां के हीरो जसबीर जस्सी) मेरे छोटे भाई की तरह हैं। इन्होंने कहा कि खां साहब जरूर चलना है। मैंने कहा, भाई खां साहब का तो पता नहीं, मगर चलना जरूर है।
जिंदगी की हर चीज में लय चाहिए होती है। गाड़ी हो या गाना टेंपो सही होना जरूरी है। मैं गजल गाता हूं, जो उर्दू जबान के सहारे चलती है। मगर मेरी मादरी जबान पंजाबी है। आज से 50 साल पहले मैंने अपना करियर रेडियो पाकिस्तान के लिए दिल पे लुट देआ गाकर किया था।फिर गजल की तरफ ड्यूटी लग गई, तो पंजाबी गाना काफी कम हो गया। मगर मेरी मां कहती थी कि पंजाबी में जरूर गाना है। कई बार बोलती, ओन्हूं सद्दो, जेड़ा वड्डा खां साहब बणया फिरदा है।मैं पूछता, अम्मा जी क्या सुनाना है। तो मां कहती, नित दे विछोड़े, सारा सुखचैन खो गया सुना। मैं माई को देखता रहता और गाता रहता। हर मां अपने बेटे से बेपनाह मुहब्बत करती है, मगर जब बच्चा कुछ मशहूर हो जाए, तो माई को और प्यार आता है। उस वक्त वैसा ही कुछ हो रहा था। देखिए कितना अच्छा रहा कि बातों के सिलसिले में मां का जिक्र आ गया। उसकी दुआ के बिना सबकुछ अधूरा रहता है।
सियासत का सवाल...
(पिछले दिनों राहत फतेह अली खान को लेकर दिल्ली एयरपोर्ट पर कुछ मसला हुआ, उस दौरान पाकिस्तान में तमाम राजनेताओं ने बयानबाजी की, उससे कैसे प्रेशर कायम हुए आप कलाकारों पर...)
जिदबाजी है ये सब। प्यार तो सुर से सुर जोड़ता है। उन सियासत वालों की सुनने लगे, तो सुर गुम जाएगा। मगर हां, मेरा मानना है कि कलाकारों को कुछ रियायतें तो मिलनी ही चाहिए। मगर ठीक उसी वक्त मेरा इस बात पर भी जोर है कि फनकारों को हर मुल्क के कानूनों की कद्र करनी चाहिए।
जगजीत सिंह के साथ जुगलबंदी
पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में उनके साथ जुगलबंदी की। जगजीत साहब मेरे दोस्त हैं, भाई हैं और बहुत बड़े फनकार हैं। मैं मामूली सा एक कलाकार हूं। आप लोगों का प्यार है, जो इतनी इज्जत बख्श देते हैं। अपने लिए तो बस वही याद आता है कि किधर से आया, किधर गया वो, अजनबी था...
गजल की किस्मत
हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान में भी गजल गाने वाले कम हुए हैं। मगर मेरा यकीन है कि जब तक सुनने वाले हैं, गजल तो क्या कोई भी कला खत्म नहीं हो सकती। मैं अभी अमेरिका से कॉन्सर्ट कर लौटा। कई लोग थे, जिन्हें गाए हुए के माने समझ नहीं आ रहे थे, मगर वे इसका पूरा आनंद ले रहे थे। 55 साल से गा रहा हूं और कभी नहीं लगा कि अब रुक जाना चाहिए। ये हौसला सुनने वालों से ही तो मिलता है।
मेरा फलसफा किस गजल में
(प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस सवाल पर गुलाम साहब ठहर गए और फिर बोले मेरा सच्चा सुर कहां बसता है, ये बाद में बताऊंगा। मगर बाद में गुफ्तगू के दौरान उन्होंने दिल के कुछ और दरवाजे खोले और इस सवाल का भी जवाब दिया...)
ये गजल मैं मंच पर बहुत कम ही गाता हूं। मगर जेहन के बड़े करीब है। आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक। इसके अलावा मेरे सबसे अजीज शायर नासिर काजमी साहब की लिखी दिल में एक लहर सी उठी है अभी। इसके अलावा तमाम नामचीन शायर हैं, जिनका लिखा तसल्ली बख्शता है। गालिब, जौक, फराज, फैज और आज के दौर में बशीर बद्र, राहत इंदौरी।
मेरे लिए गाने से पहले लफ्ज की अदायगी समझना और उस पर यकीन करना खासा जरूरी है। वीराने में ये सुर आबाद नहीं होते। इसलिए मैं जो भी गजल गाता हूं, वो मेरे दिल के करीब होती ही है।
मेरे गुरु की नसीहत
(सवाल ये था कि गुलाम अली साहब किसके मुरीद हैं और वह कौन सी सीख है उनकी, जो आज भी जेहन में दर्ज है...)
मरहूम बरकत अली खान साहब और बड़े गुलाम अली खां, इन्हीं से सीखा है सबकुछ। बड़े गुलाम अली खां साहब की तरह मैं भी पटियाला घराने से ताल्लुक रखता हूं। उनकी हर बात एक सबक की तरह थी। वह कहते थे आराम से गाना हमेशा। हाल बुरा हो, तो सुर अच्छे नहीं रहेंगे। इस बात की चिंता मत करना कि चेहरे पर कैसे भाव आ रहे हैं, हाथ कितने हिल रहे हैं। जब मैं ही हंसकर नहीं गाऊंगा, तो मेरे सुर कैसे मुस्कराएंगे। जब भी स्टेज पर चढ़ता हूं, यह याद रखता हूं।
कोक स्टूडियो और म्यूजिक संग हो रहे दूसरे प्रयोगों पर...
मुझे भी इसके लिए अप्रोच किया गया था, मगर वक्त नहीं निकाल पाया। बहुत अच्छा है ये सब देखना। मेरा साफतौर पर मानना है कि संगीत के साथ किया गया कोई भी प्रयोग उसकी बेहतरी की तरफ एक कदम है। कुछ न कुछ तो कर ही रहे हैं न ये नौजवान। मेरा पूरा समर्थन है, इस तरह की मुहिम को।
वो एक वाकया
एक बार कोलकाता में गा रहा था। तमाम फऱमाइश के बीच मैंने कहा कि आपको पंजाबी में कुछ सुनाता हूं। पसंद नहीं आएगा, तो बीच में ही खत्म कर दूंगा। फिर उन्हें जदो मी मेरा माइया रुसया सुनाया। आप यकीन नहीं करेंगे, उन लोगों ने इसे तीन बार सुना। तो ऐसा है निराला हिंदुस्तान और यहां के सुरीले लोग।
पाकिस्तान के हालात
हर जगह वहशीपन है, खराब हालात हैं। हम तो बस दुआ करते हैं और हर जगह गाते हैं क्योंकि सुर हौसला देते हैं।

1 टिप्पणियाँ:

Sheetal Tewari ने कहा…

tooooooooooo good