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बुधवार, मई 12, 2010

एक ड्रामा राज का, एक उस भिखारन का...

जब नवभारत टाइम्स में था, तब ये ब्लॉग लिखा था अखबार की वेबसाइट के लिए, आज दोबारा पढ़ा तो कुछ ठीक लगा, सोचा आप सबके साथ शेयर करूं


एकदम धांसू शो चल रहा है बिग बॉस - 3 का। हर रूम में, हर कोने में कैमरे फिट हैं। हर शख्स जानता है कि रील चालू है। सब ससुरे ऐक्टिंग में लगे हुए हैं। दिखाना चाहते हैं मानो रिऐलिटी शो है लेकिन स्क्रिप्ट पहले से तैयार है। कैसे तमाशा रचना है, दर्शकों को बांधे रखना है। ऐसे में मेरे अंदर का क्लैप बॉय जो सपनों की दुनिया में हीरो बनने का सपना सजाए था, जोर से चीखना चाहता है - कट। बस भी करो। अब कितनी ऐक्टिंग करोगे?
मगर नहीं, कोई रुकने को तैयार नहीं। एक बात बताऊं? कई बार तो लगता है कि अगर ये लोग ऐक्टिंग करना छोड़ दें तो शायद पूरा शो ही इतना बोरिंग हो जाए कि कोई देखे ही नहीं। वैसे भी जबसे कमाल खान शो को छोड़कर गया है, आधा मज़ा खत्म हो गया है। राजू श्रीवास्तव की नौटंकी थोड़ा-बहुत गुदगुदा देती है, बस।
ऐक्टिंग बिग बॉस के आलीशान फ्लैट में है और सड़कों और गलियों में भी। अभी कल बाइक पर सवार होकर आ रहा था। भीकाजी कामा प्लेस की रेडलाइट पर रुका। कुछ औरतें शिकार की तलाश में घूम रही थीं। दुनिया की भाषा में कहें तो ये औरतें भिखारी थीं। लोगों से कह रही थीं कि मदद करिए। एक औरत के पेट में बच्चा है, उसे अस्पताल ले जाना है। ऑटो के पैसे दे दीजिए। इन औरतों को पिछले ढाई साल से इस रेडलाइट पर देख रहा हूं। एक औरत का पेट फूला भी इतने ही वक्त से देख रहा हूं। नहीं जानता, उनमें सच में कोई गर्भवती है या फिर कपड़ों की मदद से साड़ी के अंदर फूला हुआ पेट दिखता है। कई बार उसी रेडलाइट के किनारे तिकोनी जमीन पर इन औरतों को गुटखा चबाते, बच्चे खिलाते भी देखा है। वो खालिस उनका अपना वक्त होता है। खीज-सी उठती है। बहुत जोर से, जैसे दातों में कुछ ककरैला फंस गया हो और पूरा जी कसमसा जाए। कई बार लगता है मेरे पास ये औरतें आएंगी तो चीखकर कहूंगा, शर्म नहीं आती! मुझे तुम्हारा ड्रामा पता है। बगल में सफदरजंग और एम्स हैं और अस्पताल का बहाना गढ़ती हो। मगर ऐसा हो नहीं पाता। कभी महीनों पहले एक औरत पास आई भी थी, मगर इतना ही कह पाया कि मैं रोज यहां से निकलता हूं, सब पता है, कोई और शिकार खोजो।
मगर ड्रामा बदस्तूर जारी है। भूख का ड्रामा है, एक सुविधा का ड्रामा है या फिर सिर्फ मेरे मन का फितूर, नहीं पता। बाइक आगे बढ़ी तो महाराष्ट्र चुनाव कौंध गया। यूपी का हूं। मुंबई वाले मुझ जैसों को ही भइया कहते हैं न। अभी पिछले दिनों सुकेतु मेहता की किताब मैक्सिमम सिटी पढ़ी, तो मुंबई से प्यार-सा कुछ हो गया। शायद लेखक की बदमाशी या ईमानदारी थी, जिसने मुंबई के सच को इस रूमानी अंदाज में रचा कि मकबूल में पंकज कपूर का डायलॉग याद आ गया कि मियां मुंबई हमारी महबूबा है, इसे छोड़कर हम कहीं नहीं जाएंगे।
पंकज जी, एक दिन हम भी अपने सपनों का सूटकेस लिए मुंबई आएंगे। मगर मुंबई में एक राज ठाकरे भी रहता है। औऱ यहीं से दिक्कत शुरू होती है। राज ठाकरे, जो अब हीरो बनने की कगार पर है। राज ठाकरे कभी हंसता नहीं। हंसता भी है, तो रैलियों के दौरान कभी-कभी, जब किसी लालू यादव या सोनिया गांधी का मज़ाक उड़ाता है। वो हंसी भी होठों के किनारे से फिसलने के पहले ही लपक ली जाती है। राज के माथे पर हमेशा त्यौरियां चढ़ी रहती हैं। बहुत गुस्सा जज्ब किए हो जैसे। ऐसा लगता है कि जैसे क्लैप बॉय को एंग्री यंगमैन मिल गया हो। राज ठाकरे बडे़ काबिल नेता होंगे। जब कोई उद्धव का नाम और शक्ल भी नहीं जानता था, तब से राज ठाकरे बाल ठाकरे के काम यानी राजनीति में हाथ बंटा रहे हैं। मगर बाल को भी पुत्रमोह मार गया और उन्होंने राज को दरकिनार कर उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी।
कुछ महीने बीते और राज ने पार्टी से किनारा कर लिया। मगर चाचा की पाठशाला में सीखा पाठ नहीं भूले। चाचा ने मद्रासियों को निशाना बनाया था, राज ने कहीं बडा़ लक्ष्य रखा और यूपी-बिहार के लोगों को निशाना बनाया। वही तेवर, वही कलेवर। मीडिया ने राज को बड़ा बनाया, ये बात अक्सर लोग कहते हैं। मगर मीडिया को भी कितना दोषी ठहराया जाए? हम कैमरों पर फिल्माए गए सनसनीखेज सच के इतने आदी हो गए हैं कि हमें हर दिन सोने से पहले खीज उतारने के लिए तमाम राज ठाकरे जैसों की जरूरत पड़ती है।
राज आपको उन औरतों की याद नहीं दिलाता, जो डर बेचती हैं? कहीं बेचारी औरत का बच्चा सड़क पर ही हो गया तो, कितना अनर्थ हो जाएगा! एक लिजलिजा-सा डर भर जाता है। और कई लोगों के हाथ जेब तक चले जाते हैं। राज भी ऐसा ही डर बेच रहे हैं। किसकी है मुंबई, राज की, मराठियों की, या उन मछुआरों की, जो सुबह-सवेरे मुंबा देवी का नाम लेकर खुद को समंदर में झोंक देते हैं। मुंबई हम सबकी है, क्योंकि इसे हम सबने बनाया है। मगर कैमरे के सामने यह भी एक रटा-रटाया छिछला-सा सच लगता है। इसीलिए तो कैमरे के पीछे रहने वाले करण जौहर राज की धमकी मिलते ही भागे चले जाते हैं राज की शरण में। और कैमरे वाले रिपोर्टर उनके घर के बाहर जुट जाते हैं, दयनीयता और समपर्ण के इस जादुई और काले पल को कैद करने। जोर से क्यों नहीं चीखता कोई...कट, अब बस भी करो, बहुत हो गया तमाशा।
आज रामगोपाल वर्मा औऱ सरकार राज लिखने वाले प्रशांत पांडे सोच रहे होंगे कि अब सरकार का तीसरा हिस्सा लिखने का समय आ गया है। जैसे सरकार में दोनों बेटों की मौत के बाद आखिरी में सुभाष नागरे ( अमिताभ बच्चन) कहता है कि चीकू को बुलाओ, वैसे ही क्या बाल ठाकरे आखिर में कहेंगे कि राज को बुलाओ। अभी भी बात नहीं बिगड़ी है। और फिर केके का सरकार में बोला गया वह डायलॉग, अब क्या करेगा सरकार, तो अब क्या करेंगे राज ठाकरे।
ड्रामा जारी है, हर तरफ, पूरे शोर के साथ, तमाशे के साथ। हर दिन नए ऐंगल के साथ कैमरा घूम रहा है। कोई होगा, जो कयामत के दिन, या युग बदलने के दिन रील लेकर बैठेगा, एडिट करने के लिए, या फिर दुनिया की यह पिक्चर भी डिब्बाबंद ही रह जाएगी?

मगर क्लैप बॉय जोर से चीखना चाहता है, ताकि बंद हो यह ऐक्टिंग और एडिटिंग चालू हो। कभी आपके अंदर ऐसी चीख उठती है क्या...


ये ब्लॉग एंट्री नवभारत टाइम्स के लिए लिखी थी, सो वहीं से साभार

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