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शनिवार, सितंबर 17, 2011

गुनगुनाना गुलाम अली का

फिल्म खुशियां के म्यूजिक रिलीज पर आए गायक गुलाम अली। उनके नाम के साथ कोई विशेषण जोडऩा उस शब्द को इज्जत बख्शना है, इस शख्स को नहीं। ठीक उसी तरह से गुलाम अली ने बुधवार शाम तमाम सवालों के जवाब में जो कहा, उसके सिलसिले के बीच में आना गुनाह की तरह है। इसलिए आज आप सुरीले गुलाम अली साहब के ख्याल सुनिए। बीच में आपको सिर्फ यह बताया जाएगा कि किस सवाल के जवाब में ये सुर फूटे।
मैं किस भाषा में बोलूं, उर्दू या पंजाबी, अच्छा पंजाबी में ही बात करते हैं। वैसे भी जबान का क्या, आप लोग इतने समझदार हैं।
हम आर्टिस्ट को आप जैसे समझदार सुनने वाले ही चाहिए। समझ के साथ सुनना भी बहुत सुरीला काम है। जस्सी (फिल्म खुशियां के हीरो जसबीर जस्सी) मेरे छोटे भाई की तरह हैं। इन्होंने कहा कि खां साहब जरूर चलना है। मैंने कहा, भाई खां साहब का तो पता नहीं, मगर चलना जरूर है।
जिंदगी की हर चीज में लय चाहिए होती है। गाड़ी हो या गाना टेंपो सही होना जरूरी है। मैं गजल गाता हूं, जो उर्दू जबान के सहारे चलती है। मगर मेरी मादरी जबान पंजाबी है। आज से 50 साल पहले मैंने अपना करियर रेडियो पाकिस्तान के लिए दिल पे लुट देआ गाकर किया था।फिर गजल की तरफ ड्यूटी लग गई, तो पंजाबी गाना काफी कम हो गया। मगर मेरी मां कहती थी कि पंजाबी में जरूर गाना है। कई बार बोलती, ओन्हूं सद्दो, जेड़ा वड्डा खां साहब बणया फिरदा है।मैं पूछता, अम्मा जी क्या सुनाना है। तो मां कहती, नित दे विछोड़े, सारा सुखचैन खो गया सुना। मैं माई को देखता रहता और गाता रहता। हर मां अपने बेटे से बेपनाह मुहब्बत करती है, मगर जब बच्चा कुछ मशहूर हो जाए, तो माई को और प्यार आता है। उस वक्त वैसा ही कुछ हो रहा था। देखिए कितना अच्छा रहा कि बातों के सिलसिले में मां का जिक्र आ गया। उसकी दुआ के बिना सबकुछ अधूरा रहता है।
सियासत का सवाल...
(पिछले दिनों राहत फतेह अली खान को लेकर दिल्ली एयरपोर्ट पर कुछ मसला हुआ, उस दौरान पाकिस्तान में तमाम राजनेताओं ने बयानबाजी की, उससे कैसे प्रेशर कायम हुए आप कलाकारों पर...)
जिदबाजी है ये सब। प्यार तो सुर से सुर जोड़ता है। उन सियासत वालों की सुनने लगे, तो सुर गुम जाएगा। मगर हां, मेरा मानना है कि कलाकारों को कुछ रियायतें तो मिलनी ही चाहिए। मगर ठीक उसी वक्त मेरा इस बात पर भी जोर है कि फनकारों को हर मुल्क के कानूनों की कद्र करनी चाहिए।
जगजीत सिंह के साथ जुगलबंदी
पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में उनके साथ जुगलबंदी की। जगजीत साहब मेरे दोस्त हैं, भाई हैं और बहुत बड़े फनकार हैं। मैं मामूली सा एक कलाकार हूं। आप लोगों का प्यार है, जो इतनी इज्जत बख्श देते हैं। अपने लिए तो बस वही याद आता है कि किधर से आया, किधर गया वो, अजनबी था...
गजल की किस्मत
हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान में भी गजल गाने वाले कम हुए हैं। मगर मेरा यकीन है कि जब तक सुनने वाले हैं, गजल तो क्या कोई भी कला खत्म नहीं हो सकती। मैं अभी अमेरिका से कॉन्सर्ट कर लौटा। कई लोग थे, जिन्हें गाए हुए के माने समझ नहीं आ रहे थे, मगर वे इसका पूरा आनंद ले रहे थे। 55 साल से गा रहा हूं और कभी नहीं लगा कि अब रुक जाना चाहिए। ये हौसला सुनने वालों से ही तो मिलता है।
मेरा फलसफा किस गजल में
(प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस सवाल पर गुलाम साहब ठहर गए और फिर बोले मेरा सच्चा सुर कहां बसता है, ये बाद में बताऊंगा। मगर बाद में गुफ्तगू के दौरान उन्होंने दिल के कुछ और दरवाजे खोले और इस सवाल का भी जवाब दिया...)
ये गजल मैं मंच पर बहुत कम ही गाता हूं। मगर जेहन के बड़े करीब है। आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक। इसके अलावा मेरे सबसे अजीज शायर नासिर काजमी साहब की लिखी दिल में एक लहर सी उठी है अभी। इसके अलावा तमाम नामचीन शायर हैं, जिनका लिखा तसल्ली बख्शता है। गालिब, जौक, फराज, फैज और आज के दौर में बशीर बद्र, राहत इंदौरी।
मेरे लिए गाने से पहले लफ्ज की अदायगी समझना और उस पर यकीन करना खासा जरूरी है। वीराने में ये सुर आबाद नहीं होते। इसलिए मैं जो भी गजल गाता हूं, वो मेरे दिल के करीब होती ही है।
मेरे गुरु की नसीहत
(सवाल ये था कि गुलाम अली साहब किसके मुरीद हैं और वह कौन सी सीख है उनकी, जो आज भी जेहन में दर्ज है...)
मरहूम बरकत अली खान साहब और बड़े गुलाम अली खां, इन्हीं से सीखा है सबकुछ। बड़े गुलाम अली खां साहब की तरह मैं भी पटियाला घराने से ताल्लुक रखता हूं। उनकी हर बात एक सबक की तरह थी। वह कहते थे आराम से गाना हमेशा। हाल बुरा हो, तो सुर अच्छे नहीं रहेंगे। इस बात की चिंता मत करना कि चेहरे पर कैसे भाव आ रहे हैं, हाथ कितने हिल रहे हैं। जब मैं ही हंसकर नहीं गाऊंगा, तो मेरे सुर कैसे मुस्कराएंगे। जब भी स्टेज पर चढ़ता हूं, यह याद रखता हूं।
कोक स्टूडियो और म्यूजिक संग हो रहे दूसरे प्रयोगों पर...
मुझे भी इसके लिए अप्रोच किया गया था, मगर वक्त नहीं निकाल पाया। बहुत अच्छा है ये सब देखना। मेरा साफतौर पर मानना है कि संगीत के साथ किया गया कोई भी प्रयोग उसकी बेहतरी की तरफ एक कदम है। कुछ न कुछ तो कर ही रहे हैं न ये नौजवान। मेरा पूरा समर्थन है, इस तरह की मुहिम को।
वो एक वाकया
एक बार कोलकाता में गा रहा था। तमाम फऱमाइश के बीच मैंने कहा कि आपको पंजाबी में कुछ सुनाता हूं। पसंद नहीं आएगा, तो बीच में ही खत्म कर दूंगा। फिर उन्हें जदो मी मेरा माइया रुसया सुनाया। आप यकीन नहीं करेंगे, उन लोगों ने इसे तीन बार सुना। तो ऐसा है निराला हिंदुस्तान और यहां के सुरीले लोग।
पाकिस्तान के हालात
हर जगह वहशीपन है, खराब हालात हैं। हम तो बस दुआ करते हैं और हर जगह गाते हैं क्योंकि सुर हौसला देते हैं।

बुधवार, अगस्त 31, 2011

ब्रेन गार्ड चाहिए बॉडीगार्ड देखने के लिए

सौरभ द्विवेदी
एक स्टार
एक हीरो थे, अब लगातार फ्लॉप दे रहे हैं, इसलिए एक्टर हो गए हैं, नाम है अक्षय कुमार। उन्होंने दो एक साल पहले बैक टु बैक कई सुपरहिट फिल्में दीं। उन्हें और उनसे ज्यादा प्रॉड्यूसर्स को लगा कि फॉम्र्युला मिल गया है। उसके बाद अक्षय एक हिट के लिए तरस रहे हैं। मगर बॉडीगार्ड तो सलमान खान की फिल्म है, तो फिर अक्षय का जिक्र क्यों। आज मुझे लगा कि सलमान भी उसी रास्ते पर जा रहे हैं या कहें कि धकेले जा रहे हैं। वॉन्टेड, दबंग, रेडी के खुमार में डूबकर अगर ऐसी ही फिल्में वह करते रहे तो उनकी स्टार पावर पास्ट टेंस की चीज बन जाएगी। बॉडीगार्ड में एक भी नया थॉट, डायलॉग या स्टोरी पॉइंट नहीं है। जब फिल्म खत्म होने को आई तो डायरेक्टर सिद्धीक को क्रिएटिविटी की सूझी और उन्होंने क्लाइमेक्स में कहानी के साथ ऐसे खिलवाड़ किए कि आपकी कल्पना कराहती नजर आई।
आज रेग्युलर रिव्यू नहीं, आप तो बस फिल्म के कुछ फॉम्र्युलों के बासीपन पर उदाहरण सहित नजर फरमाएं।
सलमान की एंट्री : असली शॉट ट्रांसपोर्टर 2 से लिया गया। हीरो अपने एंट्री शॉट में बहुत सारे गुंडों की धुलाई करता है और बीच-बीच में कॉमिक सिचुएशन पर गुंडों समेत हंस भी लेता है। इस शॉट को प्रभु देवा ने वॉन्टेड में सलमान की एंट्री के लिए यूज किया। अभिनव कश्यप ने दबंग में यूज किया और अब सिद्दीक ने बॉडीगार्ड में यूज किया। मकसद 1, पब्लिक को ये बताना कि तुम्हारा नायक बिना किसी नखरे के कितनों की धुलाई कर सकता है। मकसद 2, सलमान के बदन से शर्ट नाम की चिडिय़ा को हट्ट-हुर्र करके उड़ाना। मकसद 3, आगे की फिल्म की टोन सेट करना।
सलमान की एंट्री का गाना : माफ कीजिए सलमान पर फिर लौट रहा हूं क्योंकि फिल्म उनके मजबूत बदन पर टिकी है।औसत फिल्म मगर सल्लू के फेर में अच्छी ओपनिंग पाई फिल्म रेडी याद है आपको। उसका गाना ढिंका-चिका की मस्ती को फ्लैशबैक से वापस लाइए। अब एक गाना सोचिए जो मस्त हो, मगर हुड़ दबंग-दबंग वाले वीर रस से भरा हो। आओ जी-आओ जी... आ गया है देखो बॉडीगार्ड गाना तैयार है। डोले फड़काते स्लीवलेस शर्ट पहने सलमान, उनके इर्द-गिर्द भुजाएं फड़काते, दंड पेलते तमाम नौजवान। अभी सिंघम में भी कुछ ऐसा ही था न।
हीरो के साथ जोकर : एक कार्टून नायक के इर्द-गिर्द ताकि फिल्म का कॉमेडी वाला कोटा पूरा किया जा सके। वॉन्टेड में ये काम मनोज पाहवा ने किया था। जानू जानू बोलकर, फनी कपड़े पहनकर और आयशा टाकिया के आसपास घूमकर। बॉडीगार्ड में रजत रवैल ने सुनामी सिंह का किरदार निभाया है, जो मोटा है मगर मजाकिया नहीं। जब उसके डायलॉग नहीं हंसा पाते, तो डायरेक्टर उन्हें गल्र्स के कपड़े पहनाने और फिर गल्र्स से पिटवाने का उपक्रम भी कर लेते हैं, मगर हंसी, वो तब भी पराई ही बनी रहती है।
कुछ खास आवाजें और एक पंच लाइन : जब मैं एक बार कमिटमेंट कर देता हूं, तो अपनी भी नहीं सुनता, भइया जी स्माइल जैसे पंच लाइन की तर्ज पर इस फिल्म में डायलॉग है मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना। इसके अलावा सलमान के किरदार लवली सिंह की एक खास रिंगटोन और हर बार फोन बजने पर उनका कूल्हों को पुश करके चौंकना बेढब लगता है।
करीना कॉकटेल में फंसीं : कभी खुशी कभी गम में करीना का एंट्री शॉट याद करिए। इट्स रेनिंग...की तेज बीट, मस्कारा और लिपस्टिक लगातीं, चमकीली ड्रेस पहनतीं करीना। अब जब वी मेट की करीना यानी गीत को याद करिए। शानदार चटख कंट्रास्ट के कुर्ते पहनने वाली शोख नायिका।इन दोनों को मिला दीजिए। बॉडीगार्ड में करीना यानी दिव्या की एंट्री हाजिर है। इसके अलावा जब लवली और दिव्या की लव स्टोरी डायरेक्टर के हिसाब से गहरे भंवर में फंस जाती है, तब एक गाना शूट होता है। इस गाने के लिए उन्होंने मैं हूं न की सुष्मिता को, दे दना दन में अक्षय कटरीना के गाने को और थ्री इडियट्स के जूबी डूबी गाने में साड़ी में लिपटी करीना को बार-बार देखा और गाना बना दिया।
कुछ और फॉम्र्युले बाकी हैं अभी : वफादारी बहुत बड़ा मूल्य है। सिनेमा के पर्दे पर जैसे तस्वीरें बड़ी दिखती हैं ये मूल्य भी मैग्निफाई हो जाता है। उसी के इर्द-गिर्द है बॉडीगार्ड की कहानी। लवली सिंह के मां-बाप को सरताज सिंह राणा (राज बब्बर) ने बचाया, लवली उनका एहसानमंद है। अब लवली को उनकी बेटी दिव्या को बचाना है। मगर दिव्या को लवली से प्यार हो जाता है। यहीं से मुश्किल शुरू होती है। बॉडीगार्ड मालिक की बेटी से कैसे प्यार कर सकता है। यही है कहानी फिल्म की।यहां रुककर नाइनटीज में आई फिल्म बंधन को याद करिए। जो जीजा जी बोलेंगे, मैं करूंगा बोलते सलमान खान। यहां इसी रट के साथ प्रकट हुए, कि मैडम आई एम योर बॉडीगार्ड। कोई कुछ कैसे कर सकता है।
इसके अलावा स्टोरी आगे बढ़ाने के लिए इसमें कभी खुशी कभी गम की तरह मर चुकी साइड एक्ट्रेस है, जिसका बच्चा, मां की डायरी पढ़कर अपने पापा की लव स्टोरी के बारे में जानता है। फिर पापा को उनके असली प्यार से मिलवाता है। इसके अलावा गाने की और एक्शन की ऐसी-ऐसी सिचुएशन हैं, जिनका तर्क से नहीं तकलीफ से लेना देना है। फिल्म पूरा देखने की तकलीफ। बॉडीगार्ड देखने के लिए ब्रेन गार्ड चाहिए।

शुक्रवार, अगस्त 12, 2011

आरक्षण क्यूईडी प्रॉब्लम नहीं है प्रकाश

सौरभ द्विवेदी
अमिताभ बच्चन, मैथ्स के प्रफेसर और एक प्राइवेट ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे बेहद प्रतिष्ठित कॉलेज के प्रिंसिपल। एक बार अपने दूधवाले के तबेले में छोटे बच्चों को एक थ्योरम आसान उदाहरणों के जरिए सिखाते हैं। फिर एक शब्द बोलते हैं क्यूईडी यानी क्वाइट इजिली डन। डायरेक्टर प्रकाश झा ने आरक्षण जैसे जटिल मुद्दे का भी यही ट्रीटमेंट किया है, हमेशा की तरह। यहां आप ठहरकर याद कर सकते हैं गंगाजल, अपहरण और राजनीति को, प्रकाश फस्र्ट हाफ में उम्मीदें जगाते हैं, आपस में कई स्तरों पर गुंथा प्लॉट दिखाते हैं, मगर सेकंड हाफ में पहले से तय निष्कर्षों की तरफ हांफते हुए भागते हैं। यहां उनके अंदर के निर्देशक के ऊपर अंदर का बिजनेसमैन हावी हो जाता है। फिल्म को एक ड्रामेटिक और तसल्ली शुदा अंत तक पहुंचाने की हड़बड़ी उन पर हावी दिखती है। आरक्षण में भी यही हुआ। और इसके चलते मनोज वाजपेयी की उम्दा एक्टिंग, अमिताभ की रेंज और उनके सैफ और मनोज के साथ कुछ एक इंटेंस सीन वेस्ट हो गए। आरक्षण एक बार फिर इस यकीन को पुख्ता करती है कि बॉलीवुड बड़े कैनवस पर पॉलिटिकल एंगल वाला मुकम्मल स्टेटमेंट देता ड्रामा बनाने के लिए फिलवक्त तैयार नहीं।
कौन सी डोर खींचे, कौन सी काटे
पंडित छन्नू लाल मिश्र की हवा में बेताल सी डोलती आवाज जब आलाप भरती है और सुर फूटते हैं कौन सी डोर खींचे, कौन सी काटे, तो सम्मोहन पैदा होता है। सिनेमा और संगीत अपना धर्म पूरा करते लगते हैं। ये लाइन लिखने वाले प्रसून जोशी के हाथ चूमने का मन करता है। मगर फिर पूरी फिल्म के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि झा और फिल्म के राइटर अंजुम राजाबली नौकरी में आरक्षण, दलित और पिछड़ी जातियों के अंतर्विरोध, शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण और इस मैदान पर अपने-अपने पाले में खड़े हो हुंकारें भरते तमाम मोहरों को समेट नहीं पाए। फस्र्ट हाफ में फिल्म मोहब्बतें के नारायण शंकर के अनुशासन में सांस लेते गुरुकुल जैसे कॉलेज में शुरू होती है। प्रभाकर आनंद (अमिताभ) यहां के प्रिंसिपल हैं और दीपक कुमार (सैफ) यहां के सबसे होनहार स्टूडेंट, जो जाति से दलित हैं। प्रिंसिपल साहब की बेटी पूर्वी (दीपिका) दीपक की दोस्त है और ये दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं। इस ग्रुप में शामिल है सुशांत जो ऊंची जाति का है। इन सबके जीवन में हलचल आती है तब, जब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली बेंच सरकारी शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी कैटिगरी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन के पक्ष में फैसला सुनाती है। यहीं से राजनीति शुरू हो जाती है उस कॉलेज में जो प्राइवेट होने के कारण सीधे इस फैसले से प्रभावित नहीं होता, मगर यहां के लोगों की जातीय अस्मिता अचानक जाग जाती है। इस बीच कॉलेज के ही एक कोचिंग माफिया अध्यापक फलक पर उभरते हैं और अपनी राजनीति के जरिए रिजर्वेशन पर पक्ष और विपक्ष की फांक साफकर देते हैं। यहां होता है इंटरमिशन और लगता है कि आरक्षण और अनुशासन के बीच फंसा ये प्लॉट कुछ ठोस दिखाएगा। मगर इंटरवल के बाद फिल्म फोकस हो जाती है कोचिंग माफिया के ऊपर। कैसे कुछ कॉलेज और स्कूल अध्यापक अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते। फिर खोलते हैं महंगी कोचिंग जिसमें एडमिशन को बच्चे मजबूर हैं क्योंकि उन्हें रैट रेस जीतनी है। ऐसे सीन में कॉलेज से रिजर्वेशन पर अपने स्टैंड के चलते चलता किए गए प्रिंसिपल साहब को एक व्यक्तिगत वजह मिल जाती है कोचिंग माफिया से लडऩे की और तमाम मुश्किलों के बाद क्या गरीब, क्या पिछड़े क्या अगड़े सबके बच्चे एक तबेला स्कूल में पढ़कर अपना भविष्य सुधारते हैं क्योंकि उन्हें पढ़ाते हैं कुछ नेक आदर्शवादी विचारों वाले लोग।
इस कहानी को सुनकर और अगर आप फिल्म देखने चले गए तो देखकर समझ नहीं आएगा कि आरक्षण फिल्म पर मचे बवाल की वजह क्या है। आखिर इसमें कुछ भी तो भयंकर, क्रांतिकारी या नया नहीं। और सेकंड हाफ में तो फिल्म फिल्मी ट्रीटमेंट के जरिए सबका भला करे भगवान की तर्ज पर बात करने ही लगती है।
एक्टिंग पर कुछ बातें
जैसा मैंने पहले भी कहा अमिताभ सफेद दाढ़ी और फॉर्मल जोधपुरी सूट में नारायण शंकर की याद दिलाते हैं। हां आवाज में कड़की की जगह एक सर्द नरमी जरूर है। फिर सेकंड हाफ में अपनों और दुश्मनों से जूझते वक्त वह विरुद्ध के मजबूर और फिर संकल्पशील पिता की याद दिलाते हैं, जो लेंस के पीछे छिपी पनियाई आंखों में अपने आदर्शों को घुलने नहीं देता। आरक्षण अगर कुछ जमी तो अमिताभ उसकी एक अहम वजह हैं। मनोज वाजपेयी ने मिथलेश सिंह के रोल में एक बार फिर कमाल अभिनय किया। राजनीति में भी वही बेस्ट थे।याद कीजिए वीरेंद्र प्रताप सिंह के हवा में हाथ झुलाकर करारा जवाब दिया जाएगा वाले डायलॉग को। मनोज अमिताभ के साथ किसी भी फ्रेम में कमजोर नहीं दिखे। साझा फ्रेम की ही बात करें तो अमिताभ से आरक्षण पर उनका स्टैंड पूछते सैफ उम्मीदें जगाते लगे। कलमी मूंछें और प्लेट वाली हेयर स्टाइल और बिना टक इन किए शर्ट में वह स्कॉलर वाली टिपिकल इमेज क्रिएट करते हैं। मगर सेकंड हाफ में उनकी एक्टिंग फ्लैट हो जाती है। स्क्रिप्ट में भी ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती उनके लिए। दीपिका शहरी लड़की के रोल में चुहल के मोमेंट्स अच्छे से क्रिएट करती हैं, अच्छा लगता है गाने को वह एक देह बख्शती हैं, मगर उनके रोल में एक किस्म के भदेसपन की गुंजाइश थी, जो उन्होंने गंवा दिया।उन्हें अपने इलीट तेवर विसर्जित करने के लिए अपने को स्टार सैफ की ओमकारा देखनी चाहिए।प्रतीक बब्बर फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं, उनका रोल अधूरा, उनके हाव-भाव भौंचक्के से। एक संभावनाशील एक्टर का इस तरह वेस्ट होना अखरता है।
और अंत में...
आरक्षण निराश करती है, कई स्तरों पर। इसमें शुरू किया गया राजनीतिक विमर्श सरलीकरण का शिकार है। इसके अलावा फिल्म में कई चीजें जबरन हैं, जैसे दे दे मौका गाना, जिसका कोई ओर-छोर और औचित्य नहीं। इसके अलावा कहानी को फाइनल रिलीफ देने के लिए हेमा मालिनी के किरदार का सहारा भी जमता नहीं। आखिर आरक्षण या एजुकेशन सिस्टम पर कोई भी लड़ाई इसी सिस्टम के अंगों के सहारे लड़ी जानी है, किसी गार्जियननुमा दैवीय से दिखते हस्तक्षेप के जरिए नहीं। प्रकाश झा ने दामुल जैसी तीखी क्लैसिक फिल्म बनाई, जो नहीं चली। झा ने बड़ी स्टार कास्ट के साथ राजनीति बनाई जो सुपरहिट रही। इस फिल्म में न तो तीखापन है और न ही बड़ी स्टारकास्ट के बावजूद हिट होने की कोई वजह।


शनिवार, अगस्त 06, 2011

नेक ख्यालों वाली बोरिंग फिल्म

टीवी सिरीज को फिल्म में बदलने के अपने जोखिम हैं। टीवी सीरियल 24 मिनट का और कम से कम तीन ब्रेक वाला होता है। ऐसे में हफ्तों महीनों में जिन किरदारों से राब्ता कायम होता है, उनकी हरकतों के साथ एक पहचान स्थापित हो जाती है। इसलिए आगे चलकर बार बार वो तनाव नहीं बुनना पड़ता, जो किसी किरदार को उसकी खास रंगत मुहैया कराता है। ऑफिस ऑफिस बीते बरसों का ऐसा ही सीरियल था। इसके किरदार अपनी सिग्नेचर टोन के साथ हमारी बातचीत और जेहन का एक हिस्सा बन गए थे। पानी में जो दिखती नहीं, वो छवि हूं मैं, मुसद्दी लाल नाम है मेरा, कवि हूं मैं, जैसे तमाम वन लाइनर आज भी बिना किसी जतन के याद हैं, क्योंकि ऑफिस ऑफिस सहज ह्यूमर का अड्डा था। शुक्ला जी की पान की पीक, ऊषा जी का खींचकर बोलना वही तो और भाटिया जी के रोल में गब्दू टेट्रा चिन दिखाते मनोज पाहवा का हमेशा समोसे खाते रहना, सब कुछ सरकारी तंत्र पर बुने गए व्यंग्य का एक अनिवार्य हिस्सा लगता था।
सीरियल पर इतनी बात क्योंकि इसकी थीम पर बनी फिल्म चला मुसद्दी ऑफिस ऑफिस में ये सब किरदार और यही सरल बातें होने के बावजूद कुछ मिसिंग है। कहानी उबाऊ हो जाती है, अपेक्षित हो जाती है और किरदार बिना सींग के पालतू बैल जैसे हो जाते हैं, जो अपने ऊपर बैठा कौआ भी नहीं उड़ा सकते।
कई पेच ढीले रह गए
फिल्म में पुराने सेटअप के अलावा एक नया किरदार आया है बंटी त्रिपाठी का। ये मुसद्दीलाल जी के बेटे हैं और निठल्ले हैं। इसे निभाया है गौरव कपूर ने।स्किनी से गौरव कपूर एमटीवी वी टीवी के यो टाइप प्रोग्रैम होस्ट करें और टाइम मिले तो आईपीएल मैच के पहले बेवकूफाना सवाल पूछें। फ्रेम में एक तरफ पंकज कपूर और दूसरी तरफ गौरव कपूर को देखना कागजी नींबू वाले अचार को पीतल के बर्तन में रखने की तरह है। मुसद्दी लाल के चेहरे की करुणा गौरव की ओवर एक्टिंग के चलते मजाक में बदल जाती है। और याद रहे मुसद्दी मजाक का नहीं पीड़ा से उभरे व्यंग्य का नायक है। इसीलिए वो कॉमेडी सर्कस के जमाने में कुछ भदेस ठहाकों की जमीन मुहैया कराता रहा है। इस पैच वर्क के अलावा जमे जमाए कैरेक्टर भी दोहराव के शिकार लगे हैं। फिल्म उनके ढर्रेदार डायलॉग के सहारे आगे बढऩे के जतन में घिसटने लगती है। ऐसा लगता है कि जैसे पूरी फिल्म के दौरान डायरेक्टर राजीव मेहरा इस उहापोह के शिकार रहे कि मुसद्दीलाल की टोन और चेहरे के भावों के उतार चढ़ाव के जरिए कॉमेडी पैदा की जाए या उनके आसपास जमा सरकारी जमूरों की टोली के बोल बचनों के जरिए।
कुछ भला भी लगा क्या
एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी से : कहते हैं ठीक कर देंगे, अरे हम कोई बीमारी थोड़े ही न हैं, जो ठीक हो जाएंगे।
सरकारी तंत्र की मानसिकता पर ऐसे ही कुछ मार्के वाले व्यंग्य हैं फिल्म में, जो गुदगुदाते हैं। इसके अलावा चपरासी शुक्ला का हर बात के बाद पान की पीक थूकने का मेटाफर अच्छा है। इस बारे में सोचते ही कि कोई आगे पीछे देखे बिना कहीं भी पान थूक सकता है, एक घिन सी उठती है। मगर कमाल ये कि पूरी फिल्म में वो पीक सिर्फ एक बार दीवार पर दिखाई गई। बाकी रील में कैमरे को पीक गिरने की आवाज सुनाने तक सीमित रखा गया। इस अदृश्य पीक से जो घिन पैदा होती है, वो कहीं गहरी है। दरअसल ये पीक नहीं वो बदबू है, सीलन है, जो हर सरकारी दफ्तर में भरी है। आप यहां एंटर करिए, सफेद कलई से पुती दीवारें, काली भूरी हो चुकी कुर्सियों पर झूलते बाबू, चाय ले जाता छोटू, खैनी रगड़ते चपरासी और बेअदबी से बात करते कर्मचारी नजर आएंगे।
और अंत में...
फिक्स्ड ट्रैक से हटकर कुछ अप्रत्याशित होता लगता है फिल्म के अंत में, मगर फिर ये भी लगे रहो मुन्ना भाई के घूस से तंग बूढ़े वाले सीन से प्रेरित लगता है। इसके अलावा गाने के नाम पर मुसद्दी मुसद्दी गाते मकरंद देशपांडे कहानी की सुस्ती को और भी बोझिल कर देते हैं। फिल्म में बार--बार कॉमनमैन की बात की गई है। मगर डायरेक्टर भूल जाते हैं कि आम आदमी कॉमेडी फिल्म हंसने के लिए देखने जाता है, घड़ी देखने के लिए नहीं। वह ये भी भूल जाते हैं कि अकेले पंकज कपूर के सहारे फिल्म नहीं खिंच सकती।

नेक ख्यालों वाली बोरिंग फिल्म

टीवी सिरीज को फिल्म में बदलने के अपने जोखिम हैं। टीवी सीरियल 24 मिनट का और कम से कम तीन ब्रेक वाला होता है। ऐसे में हफ्तों महीनों में जिन किरदारों से राब्ता कायम होता है, उनकी हरकतों के साथ एक पहचान स्थापित हो जाती है। इसलिए आगे चलकर बार बार वो तनाव नहीं बुनना पड़ता, जो किसी किरदार को उसकी खास रंगत मुहैया कराता है। ऑफिस ऑफिस बीते बरसों का ऐसा ही सीरियल था। इसके किरदार अपनी सिग्नेचर टोन के साथ हमारी बातचीत और जेहन का एक हिस्सा बन गए थे। पानी में जो दिखती नहीं, वो छवि हूं मैं, मुसद्दी लाल नाम है मेरा, कवि हूं मैं, जैसे तमाम वन लाइनर आज भी बिना किसी जतन के याद हैं, क्योंकि ऑफिस ऑफिस सहज ह्यूमर का अड्डा था। शुक्ला जी की पान की पीक, ऊषा जी का खींचकर बोलना वही तो और भाटिया जी के रोल में गब्दू टेट्रा चिन दिखाते मनोज पाहवा का हमेशा समोसे खाते रहना, सब कुछ सरकारी तंत्र पर बुने गए व्यंग्य का एक अनिवार्य हिस्सा लगता था।
सीरियल पर इतनी बात क्योंकि इसकी थीम पर बनी फिल्म चला मुसद्दी ऑफिस ऑफिस में ये सब किरदार और यही सरल बातें होने के बावजूद कुछ मिसिंग है। कहानी उबाऊ हो जाती है, अपेक्षित हो जाती है और किरदार बिना सींग के पालतू बैल जैसे हो जाते हैं, जो अपने ऊपर बैठा कौआ भी नहीं उड़ा सकते।
कई पेच ढीले रह गए
फिल्म में पुराने सेटअप के अलावा एक नया किरदार आया है बंटी त्रिपाठी का। ये मुसद्दीलाल जी के बेटे हैं और निठल्ले हैं। इसे निभाया है गौरव कपूर ने।स्किनी से गौरव कपूर एमटीवी वी टीवी के यो टाइप प्रोग्रैम होस्ट करें और टाइम मिले तो आईपीएल मैच के पहले बेवकूफाना सवाल पूछें। फ्रेम में एक तरफ पंकज कपूर और दूसरी तरफ गौरव कपूर को देखना कागजी नींबू वाले अचार को पीतल के बर्तन में रखने की तरह है। मुसद्दी लाल के चेहरे की करुणा गौरव की ओवर एक्टिंग के चलते मजाक में बदल जाती है। और याद रहे मुसद्दी मजाक का नहीं पीड़ा से उभरे व्यंग्य का नायक है। इसीलिए वो कॉमेडी सर्कस के जमाने में कुछ भदेस ठहाकों की जमीन मुहैया कराता रहा है। इस पैच वर्क के अलावा जमे जमाए कैरेक्टर भी दोहराव के शिकार लगे हैं। फिल्म उनके ढर्रेदार डायलॉग के सहारे आगे बढऩे के जतन में घिसटने लगती है। ऐसा लगता है कि जैसे पूरी फिल्म के दौरान डायरेक्टर राजीव मेहरा इस उहापोह के शिकार रहे कि मुसद्दीलाल की टोन और चेहरे के भावों के उतार चढ़ाव के जरिए कॉमेडी पैदा की जाए या उनके आसपास जमा सरकारी जमूरों की टोली के बोल बचनों के जरिए।
कुछ भला भी लगा क्या
एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी से : कहते हैं ठीक कर देंगे, अरे हम कोई बीमारी थोड़े ही न हैं, जो ठीक हो जाएंगे।
सरकारी तंत्र की मानसिकता पर ऐसे ही कुछ मार्के वाले व्यंग्य हैं फिल्म में, जो गुदगुदाते हैं। इसके अलावा चपरासी शुक्ला का हर बात के बाद पान की पीक थूकने का मेटाफर अच्छा है। इस बारे में सोचते ही कि कोई आगे पीछे देखे बिना कहीं भी पान थूक सकता है, एक घिन सी उठती है। मगर कमाल ये कि पूरी फिल्म में वो पीक सिर्फ एक बार दीवार पर दिखाई गई। बाकी रील में कैमरे को पीक गिरने की आवाज सुनाने तक सीमित रखा गया। इस अदृश्य पीक से जो घिन पैदा होती है, वो कहीं गहरी है। दरअसल ये पीक नहीं वो बदबू है, सीलन है, जो हर सरकारी दफ्तर में भरी है। आप यहां एंटर करिए, सफेद कलई से पुती दीवारें, काली भूरी हो चुकी कुर्सियों पर झूलते बाबू, चाय ले जाता छोटू, खैनी रगड़ते चपरासी और बेअदबी से बात करते कर्मचारी नजर आएंगे।
और अंत में...
फिक्स्ड ट्रैक से हटकर कुछ अप्रत्याशित होता लगता है फिल्म के अंत में, मगर फिर ये भी लगे रहो मुन्ना भाई के घूस से तंग बूढ़े वाले सीन से प्रेरित लगता है। इसके अलावा गाने के नाम पर मुसद्दी मुसद्दी गाते मकरंद देशपांडे कहानी की सुस्ती को और भी बोझिल कर देते हैं। फिल्म में बार--बार कॉमनमैन की बात की गई है। मगर डायरेक्टर भूल जाते हैं कि आम आदमी कॉमेडी फिल्म हंसने के लिए देखने जाता है, घड़ी देखने के लिए नहीं। वह ये भी भूल जाते हैं कि अकेले पंकज कपूर के सहारे फिल्म नहीं खिंच सकती।